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ये है दुनिया का एकलौता मंदिर जो 365 दिन में सिर्फ खुलता है एक बार, 2 हजार साल से कायम है ये परम्परा

वर्ष में सिर्फ एक बार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही ऐसा अवसर आता है जब आम नागरिक यहां तक पहुंच पाते हैं। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर यहां भब्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क के गेट भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। भक्तगण लगभग 8 किलोमीटर के ट्रैक पैदल पार कर किला स्थित राम जानकी मंदिर दर्शन करने पहुंचते हैं।

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ये है दुनिया का एकलौता मंदिर जो 365 दिन में सिर्फ खुलता है एक बार, 2 हजार साल से कायम है ये परम्परा

ये है दुनिया का एकलौता मंदिर जो 365 दिन में सिर्फ खुलता है एक बार, 2 हजार साल से कायम है ये परम्परा

शहडोल/उमरिया। बांधवगढ़ नेशनल पार्क के किले में स्थित एतिहासिक कृष्ण मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। आस्था के आगे यहां खौफ भी छोटा पड़ गया। बाघों के मूवमेंट और दहाड़ के बीच ७ हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने यहां पर दर्शन किए। बांधवगढ़ नेशनल पार्क के ताला गेट से श्रद्धालु सुबह 8 बजे से ही किला स्थित राम जानकी के दर्शन के लिए पहुंच गए थे। बांधवगढ़ स्थित किले में राम जानकी मंदिर मे रीवा रियासत के वंशज व महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव के पोते दिव्यराज सिंह द्वारा पूजा अर्चना की गई। झमाझम बारिश में भी श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं हुई और ८ किमी पैदल चलकर मंदिर दर्शन के लिए पहुंचे। कलेक्टर स्वरोचिष सोमवंशी , एसपी सचिन शर्मा एवं बांधवगढ़ नेशनल पार्क के क्षेत्र संचालक स्वयं मानीटरिंग करते रहे। मेला के लिए सुबह 7 बजे से लगभग 12 बजे तक प्रवेश दिया गया और 5 बजे तक मेला स्थल से श्रद्धालुओं को बाहर कर दिया गया।
वर्ष में सिर्फ एक बार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही ऐसा अवसर आता है जब आम नागरिक यहां तक पहुंच पाते हैं। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर यहां भब्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क के गेट भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। भक्तगण लगभग 8 किलोमीटर के ट्रैक पैदल पार कर किला स्थित राम जानकी मंदिर दर्शन करने पहुंचते हैं। बांधवगढ़ किला स्थित राम जानकी मंदिर में प्रत्येक वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर मेला लगता है। बांधवगढ का किला लगभग 2 हजार वर्ष पहले बनाया गया था। जिसका जिक्र शिव पुराण में भी मिलता है। इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था। किले में जाने के लिये मात्र एक ही रास्ता है जो बांधवगढ नेशनल पार्क के घने जंगलो से होकर गुजरता है। जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान कृष्ण का जन्म बांधवगढ किले में पारंपरिक उत्सव और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस किले के नाम के पीछे भी पौराणिक गाथा है। कहते हैं भगवान राम ने वनवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को यह किला भेंट किया था। इसी लिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला रखा गया है। स्कंध पुराण और शिव संहिता में इस किले का वर्णन मिलता है। बांधवगढ़ की जन्माष्टमी सदियों पुरानी है, पहले ये रीवा रियासत की राजधानी थी तभी से यहां जन्माष्टमी का पर्व धूमधूम से मनाया जाता रहा है और आज भी इलाके के लोग उस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
भगवान विष्णु की विशाल पत्थर की मूर्ति
इस ट्रेक पर पहला पडाव शेष शैया है जहां एक छोटा कुंड (तालाब) है जो प्राकृतिक खनिज से भरपूर और ठंडा पानी श्रद्धालुओ को प्यास बुझाने के लिये देता है । यहां उन्हे भगवान विष्णु की लेटी हुई विशाल पत्थर की मूर्ति जिसे शेष सैय्या के नाम से जाना जाता है, के दर्शन के लाभ मिलते हैं। साल भर पानी की एक अविरल धारा उनके पैर से आती है और तालाब में एकत्रित होती है। वहां कई विशाल दरवाजें स्थित है ,जिनका निर्माण किले की सुरक्षा के लिये किया गया था। इन दरवाजो को पार करने के बाद श्रद्धालु राम जानकी मंदिर पहुचते है। जहां भक्तगण जन्माष्टमी समारोह में वर्षा से भीगते हुये घने जंगलो, वादियों और पहाडो का लुत्फ लेते हुये पहुंचते है।
बांधवगढ में जन्माष्टमी के अवसर पर परपंरागत रूप से भगवान कृष्ण की हांडी को तोडने के लिये मानव पिरामिड बनाते है। बाघो की विशेष आबादी वाला नेशनल पार्क 30 जून से 30 सितंबर तक पर्यटको के लिए बंद कर दिया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यह विशेष रूप से खोला जाता है।
बाघ का मूवमेंट और फुटप्रिंट भी
अधिकारियों के अनुसार, जिस मार्ग से होकर श्रद्धालु मंदिर तक पहुंचे हैं, वहां अक्सर एक बाघिन का मूवमेंट रहता है। इसके साथ ही किले के आसपास भी कुछ फुटप्रिंट मिले थे। पार्क प्रबंधन ने सुरक्षा के मद्देनजर जगह जगह हाथियों का दल लगा रखा था।