
पाण्डवकालीन है बाणगंगा कुण्ड, जल से मवेशियों को रोग से मिलती है निजात
शहडोल. नगर के बाईपास रोड स्थित बाणगंगा कुण्ड अति प्राचीन कुण्ड है। पुरातत्व विशेषज्ञ इसे कल्चुरी काल से अस्तित्व में आने की बात कह रहे हैं। वहीं जानकार से पाण्डवकालीन कुण्ड बताते हैं। ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के समय इस कुण्ड का निर्माण किया गया था। जिसे लेकर यह कथा प्रचलित है कि अर्जुन ने अश्त्र-सशस्त्र धुलने के लिए बाण से इस कुण्ड का निर्माण किया था। जिस वजह से इसका नाम बाणगंगा कुण्ड पड़ा। पुरातत्व विशेषज्ञ बताते हैं कि यहां स्थित विराट मंदिर के समय से यह कुण्ड भी अस्तित्व में आया। कुण्ड की जो बंधान है वह कल्चुरी कालीन ही है। यह कुण्ड काफी प्राचीन होने के साथ ही लोगों की आस्था का केन्द्र भी है।
स्नान और पूजा पाठ करने उमड़ती है भीड़
उल्लेखनीय है कि बाणगंगा कुण्ड ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यहां पर्व विशेष पर सैकड़ो की तादाद में लोग स्नान व पूजा पाठ के लिए पहुंचते है। सूर्य ग्रहण, मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि के साथ ही अन्य पर्वो पर यहां भारी भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु कुण्ड में स्नान कर विधि विधान से यहां पूजा अर्चना करते हैं।
ले जाते हैं जल
बाणगंगा कुण्ड के जल को लेकर यह भी मान्यता है कि यह जल औषधीय गुणो से युक्त है। मवेशियों में होने वाले खुरपका रोग के लिए यह काफी कारगर है। जिसके चलते दूर-दराज से लोग यहां इस जल को लेने आते हैं। जिससे मवेशियों को जल्द ही इस बीमारी से निजात भी मिलती है। लोगों का यह विश्वास आज भी कायम है और लोग यहां आते हैं और यहां के जल को लेकर जाते हैं।
बाणगंगा कुण्ड प्राचीन काल से हैं। विराट मंदिर के समय से ही यह अस्तित्व में है। इसकी बंधान कल्चुरी कालीन है। हालांकि मान्यता यह भी है कि पाण्डवो ने यहां अज्ञातवास बिताया था। उस दौरान अपने अश्त्र-सश्त्र धुलने के लिए बाण से इस कुण्ड का निर्माण किया था। लोगों का विश्वास है कि इस कुण्ड के जल से मवेशियों में होने वाला खुरपका रोग पूर्ण रूप से ठीक हो जाता है।।
आर एस परमार, पुरातत्वविद
Published on:
16 Jan 2021 08:24 pm
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