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पहले 30 एकड़ भूमि में लगता था बाणगंगा का मेला, अब 10 एकड़ में सिमटा

मेले में सजेंगी 500 से अधिक दुकानें, दूर दराज से एक हफ्ते पूर्व पहुंचे व्यापारी

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मेले में सजेंगी 500 से अधिक दुकानें, दूर दराज से एक हफ्ते पूर्व पहुंचे व्यापारी
शहडोल. बाणगंगा में मकर संक्राति को लेकर मेले की तैयारी पूर्ण हो गई है। नगरपालिका ने मेला मैदान की साफ-सफाई करने के बाद व्यापारियों के लिए दुकान रेखांकित कर दिया है। एक सप्ताह पूर्व से ही दूर दराज के व्यापारी बाणगंगा मेला मैदान पहुंचकर अपनी दुकानें सजाने में जुट गए हैं। 14 जनवरी मंकर संक्रांति के पर्व में सुबह पूजा अर्चना के बाद मेले का शुभारंभ किया जाएगा। यह मेला हर वर्ष की तरह इस बार भी पूरे 7 दिनों तक रहेगा। यहां हर रोज हजारों की संख्या में लोग पहुंचकर मेला का लुत्फ उठाते हैं। करीब 125 वर्ष से बाणगंगा मेले का आयोजन किया जा रहा है। नगरवासियों की माने तो शुरुआती दौर में यह मेला 30 एकड़ भूमि में सजता था, जो आज करीब 10 एकड़ में सिमट गया है। पहले मेला आने वालों की संख्या सैकड़ों में होती थी, और जगह पर्याप्त होता था, आज मेला आने वालों की संख्या हजारों की तादात में होती है लेकिन जगह की कमी पड़ रही है।
125 साल से चली आ रही परम्परा
बांणगंगा मेला का आयोजन लगभग 125 वर्षों से निरंतर किया जा रहा है। इस मेले की शुरूआत रीवा के महाराजा गुलाब सिंह ने 1895 में कराई थी। तब से बांणगंगा में निरंतर मेले की परम्परा चली आ रही है। आधुनिकता के साथ-साथ मेले के आयोजन में भी परिवर्तन होता चला आ रहा है। वरिष्ठ नागरिकों की माने तो पहले मेला में मनोरंजन के लिए सिर्फ रहट झूला हुआ करता था, इसके अलावा पूजा पाठ की संामग्री, मिट्टी के बर्तन आदि की दुकानें लगती थी, जो 30-40 की संख्या में होती थी। जैसे-जैस आधुनिकता का दौर बढ़ता गया वैसे-वैसे मेले का स्वरूप भी बदल रहा है। अब मेले में इलेक्ट्रानिक झूले, आकाश झूले के साथ ही अन्य कई प्रकार के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। साथ ही फैंसी दुकानें सज रह रही हैं।

बाल्मीक गौतम बताते हैं, पहले मेला का आयोजन 30 एकड़ भूमि में होता था, जो अब 8-10 एकड़ में सिमट गया है। पहले मेला आने वालों की संख्या कम होती थी और मेला का आकार बड़ा था, आज जगह कम और मेला आने वालों की संख्या हजारों में पहुंच गई है।

गिरेन्द्र सिंह बरगाही बताते हैं कि राजा राजेन्द्र बहादुर सिंह एवं पूर्व मुख्यमंत्री पंडित शंभूनाथ शुक्ल ने मेला मैदान के लिए 30 एकड़ भूमि कचेर परिवार से ली थी, इसके बदले उन्हें मुआवजा के तौर में छतरपुर में जमीन दी गई थी

बाल्मीक तिवारी बताते हैं कि कई दशकों से बाणगंगा मेंं मेला का आयोजन किया जा रहा है। नगरपालिका व राजस्व विभाग ने ध्यान नहीं दिया और धीरे-धीरे मेला मैदान की जमीन बिकती चली गई। नगरपालिक भूमि को संरक्षित नहीं कर सकी।