
Mini Brazil
शुभम बघेल@शहडोल.
मिनी ब्राजील...जी हां, इसी नाम से है विचारपुर गांव की पहचान। मैदान पर कोई किसी को 'मैसी के नाम पुकारता है तो कोई 'रोनाल्डो... बच्चे तो अपने से उम्र में बड़े किसी खिलाड़ी 'माराडोना भी कह ही देते हैं। गांव के लगभग हर घर में प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी हैं। विडम्बना यह है कि इन्हें कभी कोई मदद नहीं मिली। नतीजतन आज कोई पुताई कर रहा है तो किसी को फावड़ा चलाकर गुजर-बरस करनी पड़ रही है।
शहडोल के आदिवासी बहुल विचारपुर गांव में 3 से 5 साल की उम्र होते ही बच्चे फुटबॉल लेकर मैदान में उतर जाते हैं। हर दिन यहां 50 से 60 बच्चे फुटबॉल की बारीकियां सीखते हैं, उन्हें ट्रेनिंग देने वाले भी प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेल चुके हैं। आर्थिक तंगी के चलते उन्हें आगे न खेल पाने का मलाल है। अब यही मुसीबत युवाओं की प्रतिभा के सामने है।
15 साल पहले गांव में फुटबाल क्रांति को दिशा देने वाले सुरेश कुंडे कहते हैं, संभाग में कई उद्योग हैं। खिलाडिय़ों के लिए अलग से कोटा होना चाहिए। इससे गांव में पलायन रुकेगा और खिलाडिय़ों को नौकरी मिलने से वे आर्थिक सशक्त होंगे।
घबराती थी साइ की टीम, बदल देते थे खिलाड़ी
विचारपुर गांव के 20 युवा और 20 युवतियां राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेल चुकी हैं। गांव की सुजाता कुण्डे 15 बार और यशोदा सिंह 5 बार नेशनल खेल चुकी हैं। यशोदा की बहन सीता और गीता भी राष्ट्रीय स्तर पर अपना हुनर दिखा चुकी हैं। कोच रईस खान बताते हैं, 10 साल पहले मध्यप्रदेश फुटबॉल टीम में 7 से 8 खिलाड़ी विचारपुर से रहते थे। कई बार तो साइ(भारतीय खेल प्राधिकरण) की टीम भी विचारपुर के खिलाड़ी होने पर खिलाड़ी बदल देती थी।
नौकरियां नहीं, मजदूर करने को मजबूर
रामलाल, सोहन, राकेश जैसे ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं, लेकिन नौकरी न मिलने से पुताई और दुकानों में काम करने के लिए मजबूर हैं। चौकीदारी करने वाले खिलाड़ी ओमप्रकाश कोल, नरेश कुंडे और पुताई-पुट्टी करने वाले सीताराम कहते हैं, राष्ट्रीय स्तर पर मान बढ़ाने के बाद भी नौकरी और खेल में आगे बढऩे का मौका नहीं मिला।
15 साल पहले हुई थी शुरुआत
7 बार नेशनल और अंडर-19 नेशनल मेडलिस्ट बेस्ट स्कोरर अवार्ड के साथ इंटरनेशनल खेल चुके नीलेन्द्र कुंडे कहते हैं, पिता लंबे समय समय से बीमार हैं, लेकिन रोजगार न होने से बेहतर इलाज भी नहीं करा पा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुके कोच अनिल सिंह रेलवे में गैंगमेन की नौकरी कर रहे हैं। अनिल बताते हैं, राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद ग्वालियर से फिजिकल एजुकेशन में पढ़ाई की। उम्मीद थी कि खेल कोटे से बेहतर नौकरी मिलेगी, लेकिन मदद नहीं मिली।
आसपास के जिलों से बच्चे आते हैं सीखने
हर शाम 4 बजे से विचारपुर गांव में फुटबॉल की नर्सरी लगती है। आसपास के जिलों से भी कई खिलाड़ी यहां ट्रेनिंग के लिए पहुंचते हैं।
बनाया जा रहा फुटबॉल क्लब
संभाग में फुटबॉल क्लब बनाया जा रहा है। आने वाले दिनों में टूर्नामेंट कराएंगे। जिसमें उद्योग भी शामिल हो रहे हैं। क्लब से खिलाडिय़ों को बढ़ावा मिलेगा।
- राजीव शर्मा, कमिश्नर, शहडोल संभाग
उद्योगों में भी होगा खेल कोटा
खिलाडिय़ों के लिए उद्योगों में खेल कोटा होना चाहिए, इससे आसानी से नौकरी मिल सकेगी। नए खिलाडिय़ों के लिए प्रशासन को संसाधन उपलब्ध कराना होगा।
- नीलेन्द्र कुंडे, युवा खिलाड़ी, विचारपुर
Published on:
05 Dec 2021 08:01 pm
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