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शैला, करमा में थिरक वाले नेता-अफसर अब पहचानते नहीं हैं, पलायन को मजबूर लोक गायक

काम छूटा तो आदिवासी लोकगायक खेतों में कर रहे काम, तो कभी कर रहे मजदूरी। यही स्थिति रही तो मजदूरी करने गांव से कर जाएंगे पलायन

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शहडोल. शैला और करमा में बड़े-बड़े अफसर थिरक उठते थे। नेता और अधिकारी आदिवासी लोकगायकों के साथ फोटो भी खिंचवाते थे लेकिन कोरोना संक्रमण के बीच जब आर्थिक संकट आया तो वे ही दूरियां बना लिए। अब मदद मांगने पर पहचानते भी नहीं हैं। घर में आर्थिक समस्याएं हैं। काम छूट गया है तो परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। ऐसी ही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में हम दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे। बच्चों का पेट पालने के लिए कभी मजदूरी कर रहे हैं तो कभी खेत में काम कर रहे हैं।

ये व्यथा है उमरिया के आदिवासी बाहुल्य आकाशकोट गांव के लोक गायक राम सिंह की। कोरोना काल में आदिवासी लोक गायक आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं। १५ साल से लोक गायन से जुड़े कलाकार राम सिंह कहते हैं, काम नहीं मिलता है तो दूसरे प्रांत भी चले जाते हैं। पहले मजदूरी भी करते थे। कोरोना काल में पूरा परिवार परेशान है। सरकारी मदद भी नहीं मिल रही है। यहीं स्थिति रही तो आने वाले दिनों में मजदूरी के लिए गांव से पलायन कर जाएंगे।

जीवित रखी कला, गांव-गांव दे रहे संदेश
आकाशकोट के राम सिंह कहते हैं, हम आदिवासी परिवारों की नृत्य और गीत दशकों से चली आ रही परंपरा है। इसके बिना हम अधूरे हैं। बुजुर्गों से सीखा था। अभी तक इस लोकगायन कला को बरकरार रखा है। कोरोना काल में काम छूट गया, फिर भी हम इस कला के माध्यम से लोगों को संदेश दे रहे हैं। गांव-गांव गीतों के माध्यम से कोरोना से बचाव के लिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं।

मनोरंजन नहीं, सामाजिक चेतना उद्देश्य
लोक कलाकार भगत सिंह बताते हैं, यह परंपरा सिर्फ मनोरंजन नहीं है। सामाजिक चेतना और समाज को नई दिशा में लोकगायन देता है। हम खुद गाने तैयार करते हैं लेकिन कोरोना काल में सबने अलग कर दिया। कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।