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घर की पहचान और ऑफिस की शान होते थे टेलीफोन

नेशनल टेलीफोन डे पर विशेष-ब्राडबैण्ड और स्पष्ट आवाज के लिए टेलीफोन की महती जरूरत

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Telephone Identity and Office of Pride

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शहडोल. वर्तमान में करीब हर हाथ संचार से जुड़ा हुआ है, लेकिन वो भी दौर था जब लोगों को टेलीफोन कनेक्शन के लिए लोहे के चने चबाने पड़ते थे। जबकि आज संचार क्रान्ति के दौर में मामूली सी औपचारिकता पूरी कर लोग टेलीफोन या मोबाइल कनेक्शन हासिल कर लेते है। करीब दो दशक पहले तक टेलीफोन को स्टेटस सिंबल माना जाता था। टेलीफोन हर घर की विशिष्ट पहचान और ऑफिस की शान होते थे, लेकिन मोबाइल आ जाने से अब इसका क्रेज पहले जैसा नहीं रहा। इसके बाद भी ब्राडबैण्ड और स्पष्ट वार्तालाप के लिए टेलीफोन आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। संचार युग में टेलीफोन की महती जरूरत भी है, क्योंकि इसके माध्यम से ब्राडबैण्ड की जो स्पीड मिल सकती है, वह मोबाइल के जरिए नहीं हो सकता है। टेलीफोन में वार्तालाप की जो क्लीयरटी मिलती है, वह मोबाइल में अभी भी नहीं है। इसके अलावा टेलीफोन हम सभी को रेडिएशन से बचाता है। यही वजह है कि टेलीफोन की घटती लोकप्रियता के बाद भी जिले में आज भी 11 हजार टेलीफोन उपभोक्ता है। जिसमें करीब पांच हजार उपभोक्ता ब्राडबैण्ड के हैं।
हेण्डल घुमाने पर होती थी बात
लोगों ने वह दौर भी देखा है जब संवाद का माध्यम सीमित था और लोग टेलीफोन, तार और चिठ्ठियों पर निर्भर हुआ करते थे। अब न चिठ्ठी आती है न तार बल्कि मोबाइल की घंटिया बजती है। पहले मैग्नेट टेलीफोन एक्सचेंज लगते थे। टेलीफोन सेट के साथ छोटा जनरेटर लगा रहता था। इसमें हैण्डल लगा रहता था। लोगों को बात करने को हैण्डल घुमाना पड़ता था। तो एक्सचेंज में लगा मैग्नेट बोर्ड पर आपरेटर को सिग्नल मिलता था। इसके बाद आपरेटर उपभोक्ता के बताएं नम्बर पर काल लगा देता था।

तकनीकी बदलाव भी हुए
टेलीफोन में तकनीकी में बदलाव भी आता गया और सेटलाइट बैट्री नान मल्टीपूल एक्सचेंज स्थापित हुए। मैग्नेट एक्सचेंज के दौर में विभाग को बैट्री भी उपभोक्ताओं को देनी पड़ती थी। जबकि सीबीएनएम एक्सचेंज के दौर में इस समस्या से राहत मिल गई, क्योकि एक्सचेंज में ही बैट्री लगने लगी। बात करने के लिए एक्सचेंज में घण्टी करनी पड़ती थी। उपभोक्ता के काल करते ही एक्सचेंज में बल्ब जलने लगता था। आपरेटर तत्काल काल अटेण्ड कर उपभोक्ता के बताए नम्बर पर बात कराता था।
नए उपकरणों से भी लेस हुआ टेलीफोन
सत्तर के दशक में स्ट्राउजर एक्सचेंज लगे। उस दौर में हजारों लोगों को टेलीफोन कनेक्शन मिला। उपभोक्ता सीधे अपने शुभचिंतकों के नम्बर पर बात करने लगे। एक्सचेंज के आपरेटर की भूमिका खत्म हो गई। इसके बाद ई-टेन बी एक्सचेंज लगा। वर्तमान में एनजीएन तकनीकी के उपकरण लगाए जा रहे है। मोबाइल आने के बाद बेसिक टेलीफोन के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ। अब सिर्फ उन्हीं लोगों के घर टेलीफोन सेवा का इस्तेमाल हो रहा है जो लोग ब्राडबैण्ड कनेक्शन लिए है।
इनका कहना है
टेलीफोन में जिस प्रकार से बदलाव हुआ है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि इसका दौर फिर लौट रहा है। वर्तमान में कापर पेयर्स लाइन की जगह अब आप्टिकल फाइवर केवल का इस्तेमाल हो रहा है। जिससे ब्रांडबैण्ड की स्पीड काफी बढ़ जाएगी और वार्तालाप भी काफी क्लीयरटी आएगी।
एन के सल्लाम, एजीएम, दूरसंचार विभाग, शहडोल