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आदिवासी अंचल में सजती है रफी साहब के दीवानों की महफिल

प्रसिद्ध पाश्र्व गायक मोहम्मद रफी की 38वीं पुण्यतिथि पर विशेष रिपोर्ट, शादियों में रफी के गाए गीतों के बगैर नहीं पड़ती वरमालाएं

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tribute to mohammad rafi, rafi's jabra fan in tribal area

tribute to mohammad rafi, rafi's jabra fan in tribal area

शहडोल. हिन्दी सिने जगत के जाने-माने पाश्र्व गायक मोहम्मद रफी साहब को भला कौन नहीं जानता। उनके गाए गीत आज भी लोगों को जेहन में रचे-बसे है और आर्केस्ट्रा ग्रुप के कलाकारों की शान बने हुए है। इस जहां में शायद ही कोई ऐसा हो जो मोहम्मद रफी की आवाज का दीवाना न हो। आदिवासी अंचल में भी रफी साहब के दीवानों की कमी नहीं है और यहां भी पिछले कई दशकों से रफी के दीवानों की महफिलें सज रही है। संभागीय मुख्यालय के पिछले कई वर्षों से रफी साहब की पुण्यतिथि पर उनके गाए गीतों को स्थानीय कलाकारों द्वारा गाकर उन्हे श्रद्धांजलि दी जा रही है। संभागीय मुख्यालय के जाने-माने कलाकार अश्वनि लाहोरानी ने तो रफी साहब की याद में प्रतिवर्ष आयोजन करने का बीड़ा ही उठा लिया था। दो वर्ष पूर्व अल्प आयु में ही अश्वनि लाहोरानी जब नहीं रहे तो उनके सहयोगियों ने इस आयोजन को जारी रखा। नगर के पुराने राजेन्द्र क्लब में भी अक्सर रफी नाइट कार्यक्रम का आयोजन किया जाता रहा है। इसके अलावा वर्तमान में शादी अवसरों में होने वाली आर्केस्ट्रा में रफी साहब के गीतों की खासा फर्माइश होती है। खासतौर पर जब वरमाला कार्यक्रम होता है तब गीत दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात... और....बहारो फूल बरसाओं मेरा महबूब आया है.... जरूर गाया जाता है।
संगीत में स्वर की मजबूत पकड़
41 वर्षीय शास्त्रीय गायक संजीव द्विवेदी का रफी साहब के लिए एक अलग ही अनुभव रहा है। उन्होने बताया कि शास्त्रीय संगीत की गायकी में स्वरों मजबूत पकड़ के लिए हमे मोहम्मद रफी के गीतों को गाना होगा। उनकी गाई $गज़लों को लेाग पसंद करतेे है। दर्द भरे गीतों को सुनकर आंसू छलक ही जाते है।
संजीव द्विवेदी
गीतों पर झूम जाते हैं कलाकार
कोयलांचल के आर्केस्ट्रा कलाकार 33 वर्षीय साकिब रजा खान ने बताया कि उनके क्षेत्र में रफी के गानों के बगैर कोई आर्केस्ट्रा चल ही नहीं सकता।मंचीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में रफी साहब गीत जरूर गाए जाते हैं। कोयलांचल में अक्सर उन पर केन्द्रित कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
साकिब रजा खान
हमारे लिए भारत रत्न है रफी साहब
पिछले कई दशकों को रफी साहब की हुबहु आवाज में गाने वाले आदिवासी अंचल के 48 वर्षीय राजशंकर शुक्ला ने बताया कि हमारे लिए रफी साहब भारत रत्न है और भारत सरकार को भी चाहिए कि रफी साहब को भारत रत्न से सम्मानित किया जाए।
राजशंकर शुक्ला
गीतों पर झूम जाते हैं कलाकार
32 वर्षीय आर्केस्ट्रा कलाकार अरूण द्विवेदी ने बताया कि रफी साहब के गीतों को वह आदिवासी अंचल में पिछले बीस वर्षों से गा रहे है। इस अंचल के लोग उनके रोमांटिक गानों को पसंद तो करते ही है, पर को भी सुऩना नहीं भूलते।
अरुण द्विवेदी
रफी के गीतों ने दी पहचान
34 वर्षीय आर्केस्ट्रा कलाकार बलराम बग्गन ने बताया कि उन्होंने रफी साहब के गीतों से ही अपने कॅरियर की शुरूआत की। पहली प्रस्तुति उत्तरप्रदेश के ललितपुर में दी थी, उनकी गायकी को काफी सराहा गया था और प्रथम पुरस्कार भी मिला था।
बलराम बग्गन
शुद्ध उच्चारण की गायकी सीखी
पेशे से शिक्षक और आर्केस्ट्रा कलाकार बुढ़ार निवासी 38 वर्षीय पद्म प्रकाश ने बताया कि मैंने रफी साहब के गानों से ही गायकी सीखी है। उनकी गायकी में शब्दों का शुद्ध उच्चारण और स्वरों की बेहतर अदायगी है। यही वजह है कि उनके गाए गीतों को लोग ज्यादा सुनना पसंद करते हैं।
पदम प्रकाश

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