रामानुज संप्रदाय के मंदिर में निभाई जा रही अनूठी परंपरा,ट्रेजरी ऑफिसर के नाम पर हुआ था मंदिर का नामकरण
शाजापुर. अधिकांशत: शिव मंदिरों में सावन माह के दौरान किए जाने वाले शृंगार के समय शिवलिंग को अलग-अलग स्वरूपों में सजाया जाता है। इससे अलग शहर में एक ऐसा भी मंदिर है जिसमें यूं तो श्रीराम दरबार विराजित है, लेकिन जब सावन माह आता है तो भगवान श्रीराम दरबार शिव परिवार के स्वरूप में नजर आता है। वहीं जब श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आती है तो मंदिर में भगवान श्रीराम की प्रतिमा श्रीकृष्ण के रूप में शृंगारित होकर भक्तों को दर्शन देती है।
हम बात कर रहे हैं शहर के वजीरपुरा क्षेत्र में स्थित करीब 200 वर्ष प्राचीन खजांची मंदिर की। शहरी क्षेत्र में रामानुज संप्रदाय का यह एकमात्र मंदिर हैं। मंदिर के पुजारी पं. सीताराम तिवारी ने बताया कि ये खजांची मंदिर मूलत: राम मंदिर है। यहां मंदिर में भगवान श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण जी और हनुमानजी की प्रतिमाएं विराजित है। पं. तिवारी ने बताया कि मंदिर में हमेशा से ही यही परंपरा रही है कि जब सावन माह होता है तो यहां पर झूले के दर्शन होते है और प्रभु प्रतिमाओं का शिव परिवार के रूप में शृंगार किया जाता है। वहीं जब श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आती है तो यहां पर प्रतिमाओं का श्रीकृष्ण के रूप में शृंगार किया जाता है।
भारत सहित चार देशों की मुद्रा से होता है शृंगार
मंदिर पुजारी पं. तिवारी ने बताया कि मंदिर में प्रतिवर्ष जन्माष्टमी पर नोटों से शृंगार किया जाता है। उन्होंने कहा कि यहां पर देश के 1 रुपए से लेकर वर्तमान 2 हजार रुपए तक की मुद्रा का उपयोग शृंगार के लिए किया जाता है। वहीं पूर्व के वर्षों में प्राप्त अन्य देशों की मुद्रा का भी उपयोग शृंगार के लिए किया जाता है। इसमें अमेरिका, भूटान और नेपाल शामिल है। हालांकि इन तीनों देश की मुद्रा के एक-दो नोट ही मंदिर के पास बरसों से संरक्षित किए हुए हैं। जो शृंगार के समय उपयोग में लिए जाते हैं। पं. तिवारी के अनुसार जन्माष्टमी पर नोट से मंदिर और प्रभु प्रतिमाओं का शृंगार करने में 8-10 घंटे का समय लगता है।
चांदी के शटकोप से मिलता है भक्तों को आशीर्वाद
अपनी अलग ही पहचान लिए खजांची मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भक्तों का तांता लगता है। यहां आने वाले सभी भक्तों को रामानुज संप्रदाय की परंपरानुसार चांदी के शटकोप से आशीर्वाद प्रदान किया जाता है। मंदिर पुजारी ने बताया कि बरसों पहले से चांदी के शटकोप से आशीर्वाद दिए जाने की परंपरा जारी है। शटकोप पर भगवान की खड़ऊ के चिन्ह बने हुए है। मान्यता है कि शीश पर शटकोप रखने पर भगवान की खड़ाऊ को शीश पर धारण करने का पुण्य मिलता है। इसके चलते जन्माष्टमी पर यह परंपरा निभाई जाती है।
मंदिर पुजारी पं. तिवारी ने बताया कि मंदिर करीब 200 वर्ष पूर्व बना है। उन्होंने बताया कि करीब 200 वर्ष शाजापुर में एक ट्रैजरी ऑफिसर अपनी पत्नी के साथ निवास करते थे। नि:संतान होने के कारण ट्रैजरी ऑफिसर की पत्नी भगवान की प्रतिमा को पुत्र समान मानते हुए प्रतिदिन दर्शन के पश्चात ही अन्न ग्रहण करती थी। इसी दौरान एक बार जब वे मंदिर दर्शन करने पहुंची और मंदिर के अंदर प्रवेश किया तभी पुजारी ने भगवान के समक्ष पर्दा लगा दिया। जब ट्रैजरी ऑफिसर की पत्नी ने एक बार प्रभु के दर्शन के लिए बार-बार गुहार लगाई तो पुजारी ने यह कह दिया कि यदि हर समय भगवान के दर्शन करना है तो स्वयं ही मंदिर बनवा लो। ऐसे में भगवान के दर्शन को व्याकुल ट्रैजरी ऑफिसर की पत्नी ने मंदिर निर्माण होने तक अन्न ग्रहण नहीं करने की प्रतिज्ञा ले ली। ऐसे में तत्काल 8 बाय 8 का एक मंदिर निर्माण किया गया। इस मंदिर में बालमुकुंदाचार्य महाराज द्वारा प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी।
इसके बाद ट्रैजरी ऑफिसर की पत्नी ने अन्न ग्रहण किया और प्रतिदिन यहां सेवा करने लगी। ट्रैजरी ऑफिसर को हिन्दी में खजांची कहा जाता है। ऐसे में मंदिर का नामकरण खजांची मंदिर के रूप में हो गया। बाद में इस मंदिर की व्यवस्था झालरिया ट्रस्ट डिडवाना राजस्थान को सौंप दिया गया। आज भी मंदिर की व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा ही संभाली जाती है। मंदिर की व्यवस्था श्रीश्री 1008 श्री घनश्यामचार्य जी महाराज मंदिर की व्यवस्था देख रहे हैं। तात्कालीन समय में 8 बाय 8 के इस मंदिर के स्थान पर 45 हजार रुपए खर्च करके हवेली का निर्माण कराया गया था।