
Capital of Shakyas
सूरज चौहान
सिद्धार्थनगर. एक वह दौर था जब देश के 10 गणराज्यों में शाक्य गणराज्य का भी शुमार होता था परन्तु शासन व प्रशासन की उदासीनता से जीर्णोद्धार के अभाव में शाक्यों की राजधानी के अवशेष गुमनामी के अंधेरे में खो कर रह गए हैं। इस गणराज्य का महत्व अन्य की अपेक्षा कई गुना ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि समूचे विश्व को प्रेम, अहिंसा, करुणा व त्याग का संदेश देने वाले भगवान बुद्ध का लालन-पालन यहीं हुआ था।
छठी शताब्दी ई.पू. देश के 10 बड़े गणराज्यों में से एक राजा शुद्धोधन की राजधानी शाक्य गणराज्य, सिद्धार्थनगर जिले के बर्डपुर ब्लाक में मौजूद है। उत्तर में नेपाल सीमा से सटे कपिलवस्तु के पास गनवरिया में शाक्यों का राजमहल हुआ करता था। उस दौर में भी प्रजातंत्र को अहमियत देने वाले शाक्य गणराज्य को लोग भूल से गए हैं। उसकी गाथा इतिहास के पन्नों तक ही सिमटी है। कपिलवस्तु व गनवरिया की पुरातत्व विभाग ने खुदाई की थी तो कपिलवस्तु में मुख्य स्तूप जहां भगवान बुद्ध के अस्थि का अष्टम भाग दफन किया गया था वह मिला था। गनवरिया में खुदाई के दौरान राजप्रसाद (रॉयल पैलेस) के अवशेष मिले थे। खुदाई में मिले यह दोनों अवशेष राष्ट्रीय धरोहर हैं। पर दुर्भाग्य ही है कि कपिलवस्तु का शासन ने थोड़ा बहुत ख्याल रखा पर राजप्रसाद की ओर तो बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया इसलिए वह अपनी पहचान खोता जा रहा है।
शाक्य गणराज्य में लागू थी प्रजातांत्रिक व्यवस्था
छठी शताब्दी ई.पू. के शाक्य गणराज्य में प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम थी। गणराज्य की कार्यव्यवस्था में एक निर्वाचित अध्यक्ष होता था, जिसे राजा कहा जाता था। राजा सामान्य प्रशासन से लेकर राज्य की सारी व्यवस्थाएं देखता था। उसके पास सारे अधिकारी समाहित होते थे। इसके अलावा सेनापति, कोषाध्यक्ष व 500 मेम्बर हुआ करते थे। किसी भी निर्णय के लिए सदस्यों को आमंत्रित किया जाता था। सर्वसम्मति से ही उसे लागू किया जाता था।
बुद्धकालीन गणराज्यों को किया गया था सूचीबद्ध
1911 में रिज टी डब्ल्यू डेविडसन ने बुद्धकालीन जिन दस गणराज्यों की सूची तैयारी की थी उसमें शाक्य गणराज्य भी शामिल था। इन सभी गणराज्यों में राजा तो हुआ करते थे पर प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम थी।
जीवन के प्रथम 29 साल राजप्रसाद में गुजारे थे बुद्ध ने
भगवान बुद्ध राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। उन का बाल्यकाल राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में यहीं गुजरा था। यहीं से उनकी शादी हुई। 29 साल अपने जीवन के गुजारने के बाद वह संसार का मोह त्याग कर महल छोड़ चले गए थे।
कपिलवस्तु से लौट जाते हैं पर्यटक
देशी-विदेशी पर्यटकों का कपिलवस्तु स्तूप का दर्शन करने को आना-जाना लगा रहता है। बारहों महीने लोग आते हैं। स्तूप की परिक्रमा व सिर झुकाने के बाद यहीं से वापस चले जाते हैं जबकि स्तूप से राजप्रसाद की दूरी तकरीबन एक किमी ही होगी। पर्यटकों के न आने और शासन की उपेक्षा का आलम यही रहा तो राजप्रसाद का बाकी बचा अवशेष भी गुम होकर रह जाएगा।
Published on:
07 Oct 2017 04:32 pm

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