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कला व संगीत संस्कृति की आत्मा, समाज इसे दे प्रोत्साहन

शास्त्रीय नृत्य पर बोली बिरजू महाराज की शिष्या

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कला व संगीत संस्कृति की आत्मा, समाज इसे दे प्रोत्साहन

कला व संगीत संस्कृति की आत्मा, समाज इसे दे प्रोत्साहन

सीकर. शास्त्रीय नृत्य केवल मनोरंजन मात्र के साधन नहीं हैं। ये हमारी सभ्यता व संस्कृति के वाहक हैं। इनको प्रोत्साहन देना सरकार का नहीं वरन् समाज का दायित्व है। ये बात बुधवार को कथक गुरू व पदमश्री बिरजू महाराज की शिष्या अनीता ओडिया ने कही। वे यहां अभिव्यक्ति कला प्रशिक्षण संस्थान की ओर से शुरू हुई शास्त्रीय नृत्य की कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर पत्रकारों से बात कर रही थी।

उन्होंने वर्तमान में युवाओं का पाश्चात्य संगीत की तरफ झुकाव व भारतीय नृत्य व कला की उपेक्षा पर चिंता जताते हुए कहा कि पाश्चात्यकरण एक मनोभावना व मनस्थिति है, जिसका कोई न आधार है न कोई स्थाई भाव, और न ही कोई गुणवत्ता। इसने हमारे सामाजिक मूल्यों व ताना- बाने को विकृत करने का कार्य किया है। इसके प्रति बच्चों व अभिभावकों के साथ समाज के प्रबुद्ध वर्ग में भी जागरूकता जरूरी है। इस मौके पर संस्थान अध्यक्ष डॉ अनुपमा सक्सेना ने समाज से कला व संस्कृति की पुनजीर्वित करने के लिए आगे आने का आग्रह किया।

घर में कथक उपेक्षित

कथक नृत्यांगना ओडिया ने शास्त्रीय संगीत व प्राचीन नृत्य की उपेक्षा पर चिंता जताते हुआ कि राजस्थान जहां कथक का जन्म हुआ और यहां के घरानों ने देश दुनिया में अपनी पहचान बनाई, वहां आज कथक के प्रति लोगों में रूचि कम है। यहां इसके प्रशिक्षण का कोई केंद्र नहीं है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि शेखावाटी कला व संगीत की जननी रही है। इसके बावजूद यहां थियेटर का नहीं होना बेहद शर्म की बात है।

प्रोत्साहन जरूरी

ओरडिया ने कला और शास्त्रीय नृत्य व संगीत को सरकारी प्रोत्साहन के साथ आमजन की स्वीकार्यता पर जोर देते हुए कहा कि इसके लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए। कला को क्राफ्ट तक ले जाने के लिए प्रचार प्रसार जरूरी है। उससे युवाओं को जोडऩे के लिए समुचित काउंसलिंग की जानी चाहिए। पाठ्यक्रमों में भी उचित स्थान मिलना चाहिए।

कार्यशाला का आगाज

सीकर. अभिव्यक्ति कला प्रशिक्षण संस्थान की ओर से बुधवार को बसंत विहार स्थित कार्यालय में नृत्य कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। कार्यशाला का उदघाटन पदमश्री पंडित बिरजू महाराज की शिष्या प्रख्यात नृत्यांगना अनीता ओरडिया , सहायक निदेशक पर्यटन विभाग अनु शर्मा , शिक्षाविद प्रो. विनोद बहादुर बहादुर सक्सेना ने किया । कार्यक्रम में अनीता ओरिया ने कहा कि नृत्य एक संस्कार है जिसे एक दिन में नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए पूरे समर्पण के साथ जीवन समर्पित करना पड़ता है। इसका सीखने कोई समय नहीं है, व्यक्ति जीवनभर सीखता रहता है। अनु शर्मा ने भी संस्था के प्रयासों की सराहना की। अभिव्यक्ति की निदेशक डॉ अनुपमा सक्सेना ने कार्यशाला की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। इस दौरान जयपुर से आई कत्थक नृत्यांगना संगीता, हरीश माथुर , फुले संस्थाने के सचिव डॉ ओमप्रकाश सैनी व आरजे सूरज आदि मौजूद थे। अभिव्यक्ति के कोषाध्यक्ष डॉ नेकीराम आर्य ने आभार व्यक्त किया।