
सीकर. चार जिलों मेंकिडऩी के मरीजों को डायलिसिस के लिए अधिकृत एकमात्र केन्द्र कल्याण अस्पताल के डायलिसिस विंग में एक ही डायलाइजर को दूसरे मरीजों पर इस्तेमाल किया जा रहा है। पिछले छह माह से ऐसा किए जाने से डायलिसिस के मरीजों में संक्रमण का खतरा पैदा हो गया है। वजह पीपीपी मोड पर संचालित करने वाली कम्पनी की ओर से पर्याप्त मात्रा में डायलाइजर नहीं भेजना है। रही सही कसर निशुल्क दवा योजना के तहत आयरन के इंजेक्शन की सप्लाई नहीं होने से हो गई है। ऐसे में मजबूरी में डायलिसिस के मरीजों को बाहर से आयरन के इंजेक्शन लाने पड़ रहे हैं।
यह है कारण
बाजार में आयरन का एक इंजेक्शन करीब 250 रुपए और एक डायलाइजर के 500 से 600 रुपए लगते है। पिछले लम्बे समय से इनकी आपूर्ति नहीं होने से आयरन के इंजेक्शन बाहर से मंगवाए जा रहे हैं। वहीं पांच सौ रुपए के खर्च से बचने के फेर में अधिकांश मरीज भी बिना आयरन का इंजेक्शन लगाए डायलिसिस करवा लेते हैं। ऐसे में डायलिसिस का मरीजों को फायदा नहीं मिल पाता है और शरीर में टॉक्सिन मौजूद रहने से हिपेटाइटिस ए व बी के संक्रमण का भी खतरा बढ़ जाता है।
नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं आया
सरकार और पीपीपी मोड पर संचालित कम्पनी के बीच हुए एमओयू के अनुसार अस्पताल में संचालित केन्द्र पर माह में एक बार नेफ्रोलॉजिस्ट को विजिट करनी थी। इस विजिट के अनुसार ही मरीजों के इलाज पर नजर रखी जानी थी।
बिल रोके तो कम्पनी ने रोकी सप्लाई
पिछले छह माह के दौरान पीपीपी मोड पर संचालित कम्पनी को करीब दो लाख रुपए नहीं दिए गए हैं। इसके बाद से कम्पनी की ओर से मरीजों की संख्या के अनुसार डायलाइजर नहीं भेजे जा रहे हैं।
यह है डायलाइजर
डायलाइजर में माइक्रो फिल्टर होते हैं। जो डायलिसिस में मरीज के खून के टॉक्सिन और अशुद्धि को छान देते है। गाइडलाइन के बावजूद एक ही डायलाइजर को चार से पांच बार तक काम लिया जा सकता है लेकिन एसके अस्पताल में एक ही डाइलाजर को सात से आठ बार काम में लिया जा रहा है।
ऐसे में माइक्रो फिल्टर चॉक हो जाते हैं।
शॉर्टेज ऑफ मनी ...
एसके अस्पताल में करीब दो लाख रुपए का बिल बकाया चल रहा है। बड़ा प्रोजेक्ट होने के कारण कई बार अस्पताल प्रबंधन की ओर से देरी हो जाती है। कल नहीं नए डायलाइजर भिजवा दिए जाएंगे। हालांकि एमओयू के अनुसार नेफ्रोलॉजिस्ट सप्ताह में एक बार अस्पताल में जाते हैं।
मोहित सोनी, प्रभारी डायलिसिस केन्द्र, सीकर
यह है गणित
एसके अस्पताल में पीपीपी मोड पर संचालित डायलिसिस यूनिट के लिए सरकार की ओर से हर अस्पताल को करीब 1700 रुपए दिए जाते हैं। इसकी एवज में मरीज से 1200 रुपए लिए जाते हैं। इनमें से 400 रुपए सरकार के खाते में जमा कराए जाते हैं जबकि 800 रुपए संचालन करने वाली कम्पनी को दिए जाते हैं। और बाकी रुपए अस्पताल प्रबंधन के पास रहते हैं। इसके बावजूद आयरन के इंजेक्शन की खरीद भी नहीं कर रहे हैं।
Published on:
30 Dec 2017 10:21 am

