अब बैंगलोर में आयोजित प्रतियोगिता में जीते दो पदकलगातार पदक जीतने पर खेल कोटे नौकरी भी मिली, लेकिन ओलम्पिक में पदक जीतने के लिए संघर्ष जारी कई बार बढ़ाया धोरों का मान
अजय शर्मा.
यदि मन में कुछ करने का जुनुन हो तो तमाम मुसीबतों को हराकर सफलता का इतिहास रचा जा सकता है। यह साबित कर दिखाया है कूदन निवासी पेरा खिलाड़ी सुमन ढाका ने। वर्ष 2000 में हुए एक हादसे में पैर चोटिल हो गई। इसके बाद लगा कि मानों जिन्दगी खत्म हो गई। लेकिन हार मानने के बजाय आगे बढ़ने के खेलों में नई राहें तलाशना शुरू किया। पैर के पंजे की गहरी चोट के कारण सामान्य चलने में भी असमर्थ हो गई। इसके बाद भी घर पर ही आधे-आधे घंटे अभ्यास शुरू किया। ससुराल में घर का सारा काम निबटा कर खेताें में गाेला व तश्तरी फेंक की तैयारी की। सुमन का कहना है कि शादी के बाद खेलने की शुरुआत करने पर उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी। कई लोगों की ओर से पहले खेलों में आगे बढ़ने पर ताने मारकर मजाक बनाया जाता। लेकिन जब लगातार पदक जीते तो उनको भी हौसला बढ़ाने के लिए आगे आना पड़ा। शनिवार को ढाका ने बैंगलोर में आयोजित पांचवी अन्तराष्ट्रीय पेरा प्रतियोगिता के शॉटपुट में रजत व डिस्क्रस थ्रो में कांस्य पदक पदक जीतकर राजस्थान का मान बढ़ाया है। उन्हाेंने अपने कॅरियर की शुरूआत भी वर्ष 2003 में बैंगलोर स्टेडियम से ही की थी। सुमन का लक्ष्य पैरा ओलंपिक खेलों में देश के लिए गोल्ड मेडल लाना है।
जीते पदक तो सरकार ने भी बढ़ाया मान
राज्य सरकार की ओर से श्रेष्ठ खेल प्रदर्शन के आधार पर सुमन को प्रदेश के सर्वोच्च खेल अवॉर्ड महाराणा प्रताप पुरस्कार सम्मान भी मिल चुका है। ढाका वर्ष 2017 में चीन, 2018 में दुबई व वर्ष 2019 में शारजहां में आयोजित ओपन चैम्पियनशिप में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी है। वर्ष 2018 में ही इंडोनेशिया में हुए पैरा एशियन गेम्स में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सुखिर्या बटोरी थी।
खेलों के दम पर मिली नौकरी
दस साल में 30 से अधिक पदक जीतने के बाद भी उनकी संघर्ष यात्रा लगातार जारी है। पत्रिका से खास बातचीत में सुमन ने बताया कि पेरा ओलम्पिक खेलों में पदक जीतना उनका लक्ष्य है, इसके लिए वह पांच से छह घंटे नियमित अभ्यास भी करती है। वर्ष 2021 में सार्वजनिक निर्माण विभाग सीकर में कनिष्ठ सहायक के पद पर खेल कोटे में नौकरी मिली।
दर्द: सत्यापन के बाद भी नहीं मिल रहा पैसा
उनका कहना है कि खिलाड़ी राजस्थान का मान बढ़ाने के लिए लगातार पदक जीते रहे है। दूसरी तरफ क्रीड़ा परिषद की ओर से पदक विजेता खिलाडि़यों का सत्यापन करने के बाद भी प्रोत्साहन राशि नहीं दी जा रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार की ओर से गांव-ढाणियों में मैदान तैयार कर कोच मुहैया कराए जाए तो राजस्थान के खिलाड़ी दुनियाभर में इतिहास रच सकते है।