
सीकर. इसे विडंबना कहें या केंद्र सरकारों की अनदेखी...संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पाई है, जबकि ब्रिटिशकाल में साहित्य रचना सहित सरकारी कार्य तक इसी भाषा में होते थे। इसका जिक्र 1909 के द इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया (द इंडियन एंपायर) में है, जिसमें नेपाल में जिस राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है वह भी राजपूताना से ही वहां पहुंचना बताया है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश-विदेश में डंका बजाने वाली हमारी भाषा को हमारी ही सरकार कितना कमतर आंक रही है।
ब्रिटिश काल में राजकीय कार्य मारवाड़ी भाषा में होते थे। द इंपीरियल गजेटियर में तत्कालीन राजपुताना में बोली जाने वाली विभिन्न उपभाषाओं का जिक्र करते हुए लिखा है कि मारवाड़ी भाषा में विपुल साहित्य है। इस भाषा से हर उस भारतीय अधिकारी का परिचय है, जो स्थानीय बैंकों के खातों का निरीक्षण कर चुका है। यानी साफ है कि उस समय राजकीय कार्य मारवाड़ी में ही होते थे।
राजस्थानी भाषा को नेपाल में संवैधानिक मान्यता मिली हुई है। 1909 के गजेटियर के अनुसार नेपाल व हिमालय क्षेत्रों तक राजस्थानी भाषा का प्रसार राजपूताना से ही हुआ। लिखा है कि राजपूताना की टोलियां ही नेपाल तक पहुंची। वहां शादियां कर उन्होंने अपनी बस्तियां बसाना शुरू कर दिया। इससे मारवाड़ी भाषा नेपाल में लोकप्रिय हुई। हिमालय क्षेत्र में भी ये भाषा पहाड़ी भाषा के रूप में पहचानी गई।
राजस्थानी भाषा अमेरिका के व्हाइट हाउस में भी मान्य भाषा के रूप में दर्ज हो चुकी है। बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल में व्हाइट हाऊस में भर्ती के दौरान राजस्थानी भाषा को विशेष योग्यता में शामिल किया गया था। जानकारी के अनुसार पाकिस्तान के सिंध प्रांत में राजस्थानी व्याकरण आज भी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा है।----
राजस्थानी भाषा की मान्यता की मांग राजस्थान के एकीकरण के समय से चल रही है। विभिन्न संगठनों की मांग पर मामला 1956 में पहली बार विधानसभा में उठा था। लगातार मांग व आंदोलनों के बाद 2003 में राज्य सरकार ने पहली बार प्रस्ताव केंद्र को भेजा। 2006 में केंद्र सरकार की एसए महापात्रा समिति ने राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता लायक माना। इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ तो 2013 व 2023 में भाषा मान्यता के लिए प्रदेशवासियो ने दिल्ली में प्रदर्शन किए। पिछली सरकार में शिक्षा मंत्री बीडी कल्ला ने भी इस संबंध में केंद्र सरकार को पत्र भेजे जाने की बात कही, लेकिन राजस्थानी भाषा का आठवीं अनुसूची में शामिल होने का इंतजार अब भी जारी है।
1909 में प्रकाशित द इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया में स्थानीय बैंकिंग कार्यों में मारवाड़ी भाषा के उपयोग का जिक्र है। नेपाल व हिमालयी क्षेत्रों में भी राजस्थानी भाषा का यहां की टोलियों के जरिये पहुंचना बताया है। ऐसे में साफ है कि राजस्थान की भाषा का विस्तार उस समय देशभर में था।
अरविंद भास्कर, इतिहासकार व प्राचार्य राउमावि लालासी।
Updated on:
21 Feb 2025 12:10 pm
Published on:
21 Feb 2025 12:09 pm

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