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VIDEO : इस गांव में पहली बार हुआ किसी महिला का ऐसा अनूठा अंतिम संस्कार, परिवार में भी बदली 70 साल की सोच

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gobar ki lakdiyon se dah sanskar

unique Funeral of old woman in Danta sikar

दांतारामगढ़(सीकर).
गाय के गोबर से सिर्फ कंडे ही नहीं बनते बल्कि लकडिय़ां भी बनती हैं और इन लकडिय़ों का उपयोग राजस्थान के सीकर जिले के दांता कस्बे में एक शव के दाह संस्कार में किया गया। बुधवार को हुए इस दाह संस्कार के लिए गोबर की लकडिय़ां जयपुर से मंगवाई गई थी।

जानकारी के अनुसार दांता की मूल निवासी जिस महिला कांता सिकरिया का दाह संस्कार किया गया, उनके परिजन अहमदाबाद, कोलकाता, उड़ीसा व अन्य स्थानों पर भी रहते हैं।

परिवार में पहले मौत हुई तो उनका अंतिम संस्कार भी बाहर ही किया गया, लेकिन कांता देवी के अंतिम संस्कार के साथ ही 70 साल बाद यह पहला मौका है जब किसी परिजन का अंतिम संस्कार दांता में किया गया है।

वह भी महज इसलिए कि यहां के लोगों को भी गाय के गोबर के प्रति जागृति पैदा की जा सके। कांता देवी के पति गोसवा से जुड़े हंै। वे अहमदाबाद रहते हैं देशभर में वे गोसेवा पर व्याख्यान पर जागृति पैदा कर गायों को स्वावलम्बी बनाने का कार्य कर रहे हैं।

उनके घर में मौत हो या खुशी, ईंधन के रूप में गाय के गोबर से बनी यह लकडिय़ां ही काम में ली जाती है। इतना ही नहीं उनकी टीम देशी गाय से निर्मित दैनिक उपयोगी सौ से अधिक उत्पाद बनाती है।

ऐसे बनती हैं गोबर की लकडिय़ां

दाह संस्कार के लिए करीब दो से तीन हजार रुपए की गोबर निर्मित लकड़ी लगती है। यह जयपुर में देशी गायो की गोशाल में बनती है। पहले गोबर से गीलापन दूर किया जाता है जो जैवित खेती में खाद के रूप में काम आता है। सूखे गोबर से मशीन में लकड़ीनुमा कंडे तैयार किए जाते हैं। गीला अलग करने व लकड़ी तैयार करने की दो अलग अलग मशीने आती है तो दो लाख के करीब आ जाती है। श्याम सिकरिया ने ऐसी मशीने कोलकाता, उड़ीसा आदि अनेक जगह लगवाई है।

ईंधन का काम
राजस्थान का प्रसिद्ध चूरमा, बाटी गोबर की थेपड़ी( कंडो) पर बनाया जाता है, जो इस लकड़ी पर आसानी से बन जाता है। इंधन के रूप में इस प्रकार काम आने पर गोशालाओ में बाय के गोबर की कीमत होगी तो गाय की सार संभाल ठीक से होने लगेगी।