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14 साल की उम्र में शादी करने वाली ये ‘बालिका वधू’ यूं बन गई सबके लिए मिसाल

महज 14 साल की उम्र में बालिका वधु (बाल विवाह) बनकर ससुराल पहुंची लाडो वर्तमान में सीकर जिले की श्रेष्ठ साहित्यकार के रूप में पहचान बना रही है।

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Writer Vimla Maharia

सीकर. महज 14 साल की उम्र में बालिका वधु (बाल विवाह) बनकर ससुराल पहुंची लाडो वर्तमान में सीकर जिले की श्रेष्ठ साहित्यकार के रूप में पहचान बना रही है।

बानगी यह है कि गांव सिंगोदड़ा की इस बेटी की दर्जनभर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनके दम पर इनको श्रेष्ठ कवयित्री, भाषा सारथी व शक्ति सम्मान जैसे कई पुरस्कारों से प्रदेश व जिला स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं सिंगोदड़ा की लाडो विमला महरिया की। जिनकी शादी लक्ष्मणगढ़ में हुई थी। खेलने-कूदने की उम्र में कर देने के बाद इन्होंने अपनी पीड़ा को सहेजने के लिए रचना और कविताएं लिखना शुरू कर दिया।

खेत-खलिहान का काम व घर का चूल्हा-चौका करने के बाद रात दो बजे तक पढऩा और बालिका वधु की बिताई हुई वास्तविक जिंदगी को साहित्य में समेटते-समेटते कब खुद जानी-मानी साहित्यकार बन गई। जिसकी परिकल्पना खुद रचनाकार विमला महरिया ने भी नहीं की थी। इसके बाद अंग्रेजी, हिंदी व समाज शास्त्र से एमए कर बीएड का एग्जाम दिया और सरकारी शिक्षिका बन गई।

अब जीवन का ध्येय बना रखा है कि फिर कोई छात्रा बालिका वधू नहीं बने। इसके लिए सरल भाषा में कविता व रचना पाठ कर के माध्यम से उनमें जागरूकता फैलाने में जुटी हुई है। रचनाकार विमला महरिया उर्फ मौज का मानना है कि साहित्य के माध्यम से समाज की कुरीतियों को बदला जा सकता है और नई पीढ़ी को जागरूक कर संस्कृति तथा शिक्षा का महत्व आसानी से समझाया जा सकता है।

मिलने लगा अनुदान


साहित्य व सामाजिक बुराइयों पर लिखी गई विमला की कई पुस्तकों को अनुदान भी मिलना शुरू हो गया है। इनमें काव्य संग्रह सोन पिपासा को मध्यप्रदेश लेखिका संघ में शामिल किया जा चुका है। इसके अलावा चीत्कार की किलकारी काव्य संग्रह को राजस्थान साहित्यकार अकादमी अलग से अनुदान देकर मौज नाम की इस साहित्यकार को स्वच्छंद रखना चाह रही है।

मध्यप्रदेश के भोपाल में हिन्दी लेखिका संघ की ओर से आयोजित होने वाले 22वें वार्षिक सम्मान समारोह में प्रथम पुरस्कार लक्ष्मणगढ़ के सिंगोदड़ा गांव की युवा साहित्यकार विमला महरिया 'मौज' को दिया जाएगा।