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ऊर्जाधानी में दिन ब दिन बिगड़ती जा रही आबोहवा

पर्यावरण दिवस पर विशेष...

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Air pollution rising in Singrauli, power companies are not installing FGD

Air pollution rising in Singrauli, power companies are not installing FGD

सिंगरौली. विकास के नाम पर विनाश का सबसे अधिक दंश झेलने वाले इलाकों का जिक्र हो तो ऊर्जाधानी सिंगरौली का नाम सबसे पहले आएगा। यहां के दिन ब दिन बिगड़ते हालात और पर्यावरण सरंक्षण के नाम पर की गई केवल कागजी खानापूर्ति मुख्य वजह है। भूगर्भ में कोयले के खदान के रूप में वैसे तो कुदरत ने ही यहां के लोगों की किस्मत में प्रदूषण का दंश झेलना लिख दिया है, लेकिन स्थापित कोल व विद्युत कंपनियों ने भी यहां की आबोहवा को जहरीला बनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी है।

देश के ज्यादातर हिस्सों को बिजली मुहैया कराने वाला यह क्षेत्र जल व वायु प्रदूषण के भयानक तरीके से चपेट में है। लोगों को जहरीले आबोहवा से मुक्ति मिल सके। इसके लिए एनजीटी की ओर से एक के बाद एक करके कई आदेश जारी किए गए, लेकिन ज्यादातर आदेश केवल कागजों में दफन होकर रह गए हैं। पर्यावरण प्रदूषण से क्षेत्र को मुक्ति दिलाने की कोशिश में अधिवक्ता अश्विनी दुबे सहित अन्य लोगों ने कई प्रयास किए, लेकिन नतीजा सिफर रहा है। जिला प्रशासन हो या फिर कंपनियां प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर वर्षों से केवल आश्वासन देती चली आ रही हैं।

हवा व पानी में जहरीले रसायन हैं मौजूद
ऊर्जाधानी की आबोहवा पर पूर्व में किए गए अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट की माने तो यहां के हवा और पानी दोनों में ही सीसा, पारा, क्रोमियम व कैडमियम जैसे जहरीले और खतरनाक रसायन मौजूद हैं। यह रसायन मनुष्य में कैंसर, टीबी व दमा जैसे भयानक रोगों का कारण बन रहे हैं। बताया गया कि मोरवा क्षेत्र में हवा में पीएम-10 कण की मात्रा 500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक हो गई है। यह मात्रा निर्धारित सामान्य मानक की तुलना में कई गुना है। इसी प्रकार पीएम 2.5 की मात्रा भी 300 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक बताई जा रही है। पारा जनित प्रदूषण के मामले में देश में हो रहे कुल प्रदूषण में अकेले यहां का 10 फीसदी प्रदूषण शामिल है। गौरतलब है कि पीएम-10 के कण धूल के कणों से निर्मित होते हैं। जबकि पीएम 2.5 के कणों में डीजल-पेट्रोल और कूड़ा जलने के बाद के अंश के अलावा सीसा, पारा व कैडमियम जैसे तत्व भी मौजूद रहते हैं। यह सभी खतरनाक तत्व मनुष्य में भयानक बीमारियों का कारण बनते हैं।

चिमनियां बढ़ा रही कार्बन-डाइ-ऑक्साइड
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक कार्बन-डाइ-आक्साइड से देश में हो रहे कुल प्रदूषण का 10 फीसदी भाग केवल यहां की चिमनियों से हो रहा है। बता दें कि यहां पर करीब दो दर्जन चिमनियां 24 घंटे धुंआ उगल रही हैं। इसमें एनटीपीसी विंध्यनगर की छह, एनटीपीसी सिंगरौली शक्तिनगर की चार, हिंडालकों की छह, रिलायंस की तीन व एस्सार की एक चिमनी शामिल हैं। इसके लिए सीमेंट सहित अन्य फैक्ट्रियों की चिमनी से निकलने वाला धुंआ अलग है। कंपनियां धुएं को कम करने के बावत अधिक खर्च के मद्देनजर नए यंत्र यानी इएसपी लगाने में आनाकानी कर रही हैं। हवा में जहर घोलने के लिए इन चिमनियों के अलावा सडक़ मार्ग से हो रहा कोल परिवहन भी काफी हद तक जिम्मेदार है। हर रोज करीब 800 डंपर व हाइवा पूरे समय कोल परिवहन में लगे रहते हैं। परिवहन के समय कोयले की धूल का उडक़र हवा में घुलती है और फिर सांस के जरिए लोगों के फेफड़े में समाती है, जिससे लोग भयानक बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

रिहंद में जा रहा विद्युत कंपनियों का फ्लाइऐश
एनजीटी की ओर से सख्त निर्देश है कि विद्युत उत्पादक कंपनियों से निकलने वाला फ्लाइऐश (कोयले की राख) किसी भी स्थिति में बांध व नदियों में नहीं छोड़ा जाए। क्योंकि बांध व नदियों में इनके छोड़े जाने पर एक ओर जहां वह राख से पटते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर ऐश में मौजूद पारा, फ्लोराइड, क्रोमियम व कैडमियम जैसे खतरनाक तत्व पानी को जहरीला बना रहे हैं। रसायन भू-जल तक पहुंच रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि विद्युत उत्पादक कंपनियों की ओर से फ्लाइऐश का प्रयोग अन्य दूसरे कार्यों में संभव नहीं हो पा रहा है। नतीजा उनकी ओर से एनजीटी के निर्देशों को दरकिनार करते हुए 50 फीसदी से अधिक फ्लाइऐश रिहंद बांध सहित अन्य नदियों में छोड़ दिया जा रहा है। जिससे पानी खतरनाक रसायनों से प्रदूषित हो रहा है और पेयजल के रूप में लोगों के शरीर में जाकर उन्हें बीमार कर रहा है। इस पानी की सिंचाई से अन्न भी खतरनाक रसायनों से प्रदूषित हो रहे हैं।

एनजीटी के ये आदेश कागज तक सीमित
- फ्लाइऐश का शत-प्रतिशत प्रयोग दूसरे कार्यों में किया जाए।
- जिले की हर सडक़ को फोरलेन के रूप में विकसित किया जाए।
- कोयले का परिवहन सडक़ मार्ग से पूरी तरह प्रतिबंधित हो।
- चिमनियों से जहरीला धुआं रोकने के लिए नया इएसपी लगाया जाए।
- जल प्रदूषण वाले गांवों को चिह्नित कर जलशोधन यंत्र लगाया जाए।
- कोयले की ओपन माइंस को फ्लाइऐश से भरकर वहां पौधे लगाए जाएं।