
बूटासिंह ने जालोर-सिरोही से पहली बार 1984 में चुनाव लड़ा। इसी दौरान आबूरोड में प्रचार के दौरान विधायक जेठमल आर्य से चर्चा करते हुए।
अमरसिंह राव
सिरोही.अमूमन हर चुनाव की रोचक यादें जेहन में रहती हैं लेकिन कुछ चुनाव इतिहास बना जाते हैं। जालोर-सिरोही सीट के लिए 1998 और 2004 में हुए चुनाव भी इनमें से एक है। 1998 के चुनाव में जालोर-सिरोही सीट से निर्दलीय के रूप में चुनाव जीते सरदार बूटासिंह व अन्य दलों की मदद से देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी। इसी वजह से बूटासिंह को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कैबिनेट में लिया गया था। हालांकि, इसी बूटासिंह को 2004 के चुनाव में भाजपा की सुशीला बंगारू ने मात दे दी, जिसके बाद बूटासिंह कभी संसद नहीं पहुंच पाए। जबकि, 1999 के चुनाव में सुशीला के पति बंगारू लक्ष्मण को बूटासिंह ने ही चुनाव में हराया था। वैसे तो सरदार बूटासिंह जालोर-सिरोही संसदीय क्षेत्र से 1984 और 1991 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत चुके थे। लेकिन, 1996 के चुनाव में स्थानीय का मुद्दा उठने पर कांग्रेस ने स्थानीय चेहरे के रूप में पारसाराम मेघवाल को टिकट दिया और मेघवाल चुनाव जीत गए। लेकिन केन्द्र में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से गठबंधन की सरकार बनी। हालांकि, वह गिनती के दिन भी नहीं चल पाई। दो साल बाद ही 1998 में फिर चुनाव हुए। लेकिन, कांग्रेस ने फिर बूटासिंह का टिकट काटकर मेघवाल पर भरोसा जताया। इस पर बूटासिंह जनता के बीच में जाकर बैठ गए। गांव-ढाणी में जनसम्पर्क करने के बाद निर्दलीय के रूप में ताल ठोक दी और रेकॉर्ड मतों से जीत हासिल की। जानकार बताते हैं कि उस समय न मोबाइल था और न कोई प्रभावी ऑनलाइन नेटवर्क लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी का चुनाव चिह्न ब'चे-ब'चे की जुबां पर था। इस चुनाव में निर्दलीय बूटासिंह ने भाजपा के गेनाराम मेघवाल को एक लाख 66 हजार 85 वोटों हराया था। यहां कांग्रेस के उम्मीदवार पारसाराम तीसरे स्थान पर रहे। 1998 में भी किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था और भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई और बूटा सिंंह के समर्थन से वाजपेयी की सरकार बनी। 13 महीने तक चली इस सरकार में बूटा सिंह दूर संचार मंत्री बनाए गए। लेकिन 13 महीने बाद ही यह सरकार भी एक मत से गिर भी गई। तब देश की जनता के सामने एक वोट की अहमियत की चर्चा थी।
जालोर ने देश को गृहमंत्री भी दिया
21 मार्च 1934 को जन्मे सरदार बूटासिंह जालोर-सिरोही से चार बार सांसद रहे। तीन बार कांग्रेस से और एक बार निर्दलीय के रूप में। पहली बार 1984 में जालोर से चुनाव जीते और केन्द्र में राजीव गांधी सरकार (1984-89) में कृषि और फिर देश के गृहमंत्री भी बने। जालोर से चुनाव जीत कर देश के सबसे ऊंचे ओहदे तक पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं। बूटासिंह बिहार के राज्यपाल भी रहे। 85 साल के हो चुके बूटासिंह दिल्ली में घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। वैसे तो साल 2014 में भी कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर बूटासिंह ने दुबारा निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन 1,75,344 वोट लेने के बावजूद हार गए और तीसरे स्थान पर रहे। भाजपा प्रत्याशी देवजी पटेल ने 5,80508 वोट लेकर चुनाव जीता। कांग्रेस प्रत्याशी उदयलाल आंजणा 1,99363 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे।
2004 में पहली महिला सांसद सुशीला ने बूटासिंह को हराकर पति का हिसाब बराबर किया
1999 के चुनाव में बूटासिंह ने चौथी बार जालोर-सिरोही संसदीय सीट से ताल ठोकी। चूंकि, 1998 में निर्दलीय जीत चुके थे। ऐसे में बूटासिंह को कांग्रेस ने फिर से प्रत्याशी बना दिया। इधर, भाजपा के पास कोई बड़ा दलित चेहरा नहीं था। चूंकि जालोर-सिरोही के हजारों लोग दक्षिणी भारत में व्यापार करते है। तब कई प्रवासी दक्षिण में बंगारू की राजनीति से प्रभावित थे। ऐसे में वहां की राजनीति में वर्चस्व रखने वाले बंगारू लक्ष्मण को सामने उतारा गया। लेकिन, ये चुनाव बूटासिंह 35924 मतों से जीत गए। इसके बावजूद 1999 में वाजपेयी सरकार में बंगारू लक्ष्मण को रेल राज्यमंत्री बनाया गया। इस दौरान वे जालोर के सम्पर्क में रहे। साल 2000 से 2001 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। हालांकि बाद में पार्टी फंड के नाम पर एक लाख रुपए लेने के मामले में नाम उछलने के कारण इनको पद छोडऩा पड़ा था। यह दीगर बात है कि इस हार का हिसाब पूरा करने के लिए पांच साल इंतजार करना पड़ा। 2004 के चुनाव में भाजपा ने बंगारू की पत्नी सुशीला बंगारू को बूटा सिंह के खिलाफ उतारा और उन्होंने 39,192 वोटों से बूटासिंह को हराकर हिसाब बराबर किया। सुशीला बंगारू को जालोर से पहली महिला सांसद बनने का गौरव हासिल है। इसके बाद फिर कभी सुशीला बंगारू ने यहां से चुनाव नहीं लड़ा। हालांकि, 2009 और 2014 में देवजी पटेल को टिकट दिया गया और दोनों बार भाजपा ने यह सीट जीती। एक तरह से कहा जाए तो सुशीला बंगारू की जीत के बाद से ही यह सीट लगातार भाजपा की झोली में है।
1998-फैक्ट फाइल
बूटासिंह (निर्दलीय) को मिले मत- 365336
गेेनाराम मेघवाल (भाजपा) मिले मत- 199251
जीत का अन्तर- 1,66085
कब-कौन जीता
वर्ष प्रत्याशी पार्टी प्राप्त मत
1957 दामनी सूरज रतन आईएनसी 64434
1962 हरीश चन्द्र आईएनसी 75773
1967 डी. पाटोदिया एसडब्ल्यूए 117468
1971 कुमारसिंघी आईएनसी 138728
1977 हुकमाराम बीएलडी 168299
1980 वीरदाराम आईएनसी (आई) 217975
1984 बूटासिंह आईएनसी 281627
1989 कैलाश मेघवाल बीजेपी 300512
1991 बूटासिंह आईएनसी 330702
1996 पारसाराम मेघवाल आईएनसी 211727
1998 बूटासिंह आईएनडी 365336
1999 बूटासिंह आईएनसी 330652
2004 बी. सुशीला बीजेपी 321255
2009 देवजी पटेल बीजेपी 194503
2014 देवजी पटेल बीजेपी 580508
Published on:
20 Apr 2019 06:21 pm
बड़ी खबरें
View Allसिरोही
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
