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photo story:देसी बबूल पर भारी विलायती बबूल

- वनस्पति को लील रहा जूली फ्लोरा

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आबूरोड. जिले के वनक्षेत्र में विलायती बबूल (जूली फ्लोरा) देशी वनस्पति को लीलता जा रहा है। वन क्षेत्र के ३० फीसदी भाग में विलायती बबूल फैल गया है। इससे स्थानिय वनस्पति को भी नुकसान पहुंच रहा है। जिले में करीब १ लाख ३१ हजार ३२४ हैक्टेयर वन भूमि हैं, इसमें से करीब ३० फीसदी भूमि पर विलायती बबूल फैला हुआ है। कंटिली झाडिय़ों से घीरे इन पेड़ों को मात्र कोयला बनाने के काम आते है। यह पेड़ की खासियत है कि इसके आस-पास किसी अन्य पौधें को पनपने नहीं देता हैं। सूत्रों के अनुसार जिले में करीब ३९ हजार ३९९ हैक्टेयर भूमि पर विलायती बबूल खड़े है।
इनको हो रहा है नुकसान
विलायती बबूल उंगने के कारण धोकड़ा, देशी बबूल, थोर के पेड़ कम हो गए है। माउंट, आबूरोड, ऋषीकेश, बाहरीघाटा, वाड़ाखेड़ा जोड़ समेत अन्य हरी भरी पहाड़ी पर गूगल, अलडूसा, टेसू, खेर, बैर की झाडिय़ा बहोत होती थी, लेकिन अब यह कम हो रही है। इनका उपयोग आयुर्वेदिक दवाईयों में किया जाता था। देशी बबूल पशुओं के चारे में काम आता था, और लकड़ी भी काम में आती थी।
हवाई जहाज से गिराए थे बीज
जानकारों की मानें तो काफी वर्षो पहले राजस्थान में विलायती बबूल के बीज हवाई जहाज से गिराए गए थे। इसे बहोत कम पानी की आवश्यकता होने के कारण जल्दी पनप जाते है। इसी कारण से यह पूरे वनक्षेत्र में फैला हुआ है। इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस जूली फ्लोरा है। यह मूलरूप से दक्षिण और मध्य अमेरीका तथा कैरीबियाई देशों में पाया जाता है। इसको १८७० में भारत लाया था।
यह है नुकसान
- जहां यह बबूल होता हैं, वहां कुछ नहीं उगता हैं।
-बहोत कम मात्रा में कार्बनडाई ऑक्साइड गैस सोखता है।
-वन्य पशु पंक्षी निवास नहीं कर सकते हैं।
-लकड़ी फर्नीचर के काम भी नहीं आती है।
- घास को भी नहीं पनपने देती है।
इनका कहना...
विलायती बबूल (जूली फ्लोरा) काफी क्षेत्र में खड़ा है, इसके लिए बातचीत चल रही है, उच्चाधिकारियों के निर्देशन के बाद ही इस पर काम किया जाएगा।
- सोनल जोरिहार, उपवन संरक्षक सिरोही।