
मंडार. बांस से बनी झोपडिय़ों की डिजाइन व बनाता रमेश जोगी व अन्य।
भरत कुमार प्रजापत, रणजीतसिंह परिहार
मंडार(सिरोही).सिरोही जिले के मंडार के समीप सोनेला पंचायत के सोनानी ग्राम में परंपरागत टोकरी बनाने वाले बांस फाड़ रमेश जोगी ने हुनर व मेहनत के दम पर नए तरीके इजाद किए हैं। अब ये झूले से लेकर झोंपड़ी तक बना रहे हैं। रमेश और उनकी पत्नी ने आपदा का अवसर में बदलते हुए बांस से बनने वाली झोपडिय़ों की डिजाइन बनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। बांसों को लोहे की चूरी से चीरकर टोकरी बनाने वाले अब पति-पत्नी बांस से बनने वाली झोपडिय़ों की डिजाइन बनाते हैं। जिनकी बदलते समय के साथ रियासत ट्रेंड व लुक देने के लिए बंगलों, होटलों व मंदिरों में एकाएक डिमांड बढ़ गई है। क्रेज इतना है हाल ही में गुजरात अमीरगढ़ डाभेला में 900 स्क्वायर फीट में बड़ा हॉल 5 लाख रुपए में बना चुके हैं। सोनेला पंचायत के सोनानी गांव में पीथापुर जाने वाले मार्ग पर 30 साल से अपने परिवारों के साथ झोंपड़े में रहते हैं। वैसे मूलरूप से सोरड़ा के हैं। यहां दो भाइयों का परिवार में आठ घर है। रमेश जोगी की पहचान बांसफाड़ के रूप में है। यह परिवार बरसों से बांस को चीर कर परंपरागत बांस से बनी घरेलू उपयोग की चीजें बनाकर बेचते आए हैं।
ऐसे सीखा झोंपड़ी बनाने का काम
हालांकि बांसों से बनी चीजों की जगह अब प्लास्टिक से बनी वस्तुएं लोग ज्यादा खरीदने लगे है। ऐसे हालात में 5 बेटियों और तीन बेटे के परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया था। रमेश ने बताया झोंपड़ी बनाने का काम 25 साल पहले जयपुर और उदयपुर में अपने रिश्तेदार हरजी के यहां सीखा था। सीखने की लगन, मेहनत व हुनर से तरीका मिल गाया। मंडार में बांस उपलब्ध हो जाते हैं। स्थानीय बांस समय के साथ खराब हो जाता है। लेकिन, झोंपड़ी के लिए बांस आसाम से मंगवाना पड़ता है जो बढिय़ा क्वालिटी का है। ये काम उसकी टीम के साथ होता है। उनके साथ उसकी पत्नी उगमदेवी, पुत्र महेंद्र, ***** प्रकाश व सदाराम तथा भतीज जीतू है जो काम में माहिर हो गए हैं जो ट्रेंड को आगे ले जाकर हुनर को जीवित रखेंगे।
10 से 15 दिन में होती है एक झोंपड़ी तैयार...
झोंपड़ी की डिजाइन व बनावट में विशेष ध्यान रखा जाता है। बारिश की एक बूंद तक अंदर नहीं आती। तूफान में भी नुकसान नहीं होता है। माउंट सहित गुजरात के पालनपुर, सिद्धपुर, जाडिय़ा, दांतीवाड़ा, अमीरगढ़, मंदिरों, गोशालाओं, कृषि फार्म, होटलों व बंगलों में लगाने के लिए झोपडिय़ों की डिमांड रहती है। झोपड़ी लगाने के बाद वहां का लुक ही बदल जाता है। एक झोपड़ी तैयार करने में कम से कम 10 से 15 दिन लगते हैं। निर्माण और रंगों से सजावट में पत्नी उगम देवी भी मदद करती है।
और बढ़ती गई मांग...
शुरुआत में ढाबों व कुओं के लिए बिकती थीं। लेकिन अब धीरे धीरे इनकी मांग बड़े होटलों तक होने लगी। रमेश ने भी निर्माण में निरंतर बदलाव किया तो होटल-बंगलों तक मांग बढ़ी। मारवाड़ी, शाही शैली की झोंपड़ी बिना किसी मशीनरी के सहयोग से बनाता है। अब 45 हजार से 5 लाख तक की ऑर्डर मिलने लगे हैं। जिससे दोनों मिलकर पचास से साठ हजार रुपए प्रतिमाह आसानी से कमा लेते हैं।
पेड़ पर बनवाई झोपड़ी...
रमेश ने बताया आबू पर्वत में हमेशा जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। सुरक्षित व जानवरों से बचाव को लेकर उसने आबूपर्वत के गोमुख में एक पंजाबी महात्मा ने अपने आश्रम में खड़े पेड़ पर झोंपड़ी बनवाई है, जहां जानवरों का चढऩा मुश्किल है। यही नहीं जैन समाज के लोग बैलगाड़ी पर बांस का रथ बनवाते हैं।
Published on:
30 Jun 2022 03:12 pm
बड़ी खबरें
View Allसिरोही
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
