
फीके पड़ रहे रंगों के पर्व होली के रस्मों-रिवाज
माउंट आबू . होली चाहे ब्रज की हो, बरसाने की या फिर मारवाड़ के सिरणवा की, होली तो होली है। इसके रंगों का क्या कहना। ग्रामीण अचंल में जहां होली को बड़े ही उत्साह से मनाया जाता था, वहां अब होली के प्रति कोई खास उत्साह दिखाई नहीं देने से होली की रस्में भी फीकी पड़ती जा रही हैं।
पश्चिमी संस्कृति की आबोहवा के चलते ग्रामीण भी आधुनिक संसाधनों से चिपके रहते हैं। ऐसी स्थिति में लोकपर्व होली के रस्मोरिवाज विलुप्त होते रहे हैं। वे भी क्या दिन थे जब ग्रामीण अंचल में होली के रस भरे गीतों की गूंज देर रात तक सुनाई देती थी, वह अब बीते जमाने की याद बन कर रह गई है। कुंठा व तनाव से मुक्ति का प्रतीक यह त्योहार वास्तविक उद्देश्य से दूर मात्र खानापूर्ति बनकर रह गया है।
नजर नहीं आता हुड़दंगरमवा री बेला में सासु घरटी मंडावती, भाग नाखु घरटी में चली जाऊ पीहर (खेलने-कूदने को दिनों में सास चक्की चलवा रही है, सोचती हूं चक्की तोड़कर पीहर चली जाऊं) ..., मां म्हाने अतरी अरगी दिधी ए कोतेरो रू दूध (मां तुमने मुझे बहुत दूर ससुराल भेज दिया है, लगता है होली आई है तो अब भैया लेने आएंगे)... सरीखे गीतों की गूंज फागुन में देर रात तक सुनाई देती थी, अब मानों वह गूंज खामोश हो गई है। गीतों भरे हुड़दंग अब गांव की चौपालों पर नजर नहीं आते। ग्रामीण परिवेश में फागुन के गीतों भरी शाम का नजारा भी अलग ही हुआ करता था जहां सास के लिए कड़े अनुशासन के साथ लानत भरे गीत गाए जाते थे।
नदारद हो रहे ढूंढ की रस्म के नजारे
जानकारों के अनुसार बालक की पहली होली पर ढूंढ की रस्म के नजारे अद्भुत हुआ करते थे। तब होली संस्कार के रूप में मनाई जाती थी। अब मोहल्ले, गांव, कस्बों की चौपाल पर धुलंडी के दिन ढूंढ की रस्म के नजारे लगभग नदारद हो रहे हैं।
ऐसे होती थी ढूंढ की रस्म
होली कमेटी के प्रतिनिधि ढूंढ वाले घर लकड़ी से बने खांडे (तलवार) लेकर ढूंढाती बालक को ढूंढने निकलते थे। दादा-दादी के साथ परिवारजनों एवं सगे-सम्बंधियों से पूर्ण परिवार की रौनक देखते ही बनती थी। होली पंचों की ओर से निर्धारित दस्तूरी के साथ समारोहपूर्वक शादी के गीतों व ढोल धमाकों समेत बालक को होलिका दहन स्थल की परिक्रमा करवाई जाती थी।
Published on:
14 Mar 2022 03:43 pm
बड़ी खबरें
View Allसिरोही
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
