
कदम्ब सौंदर्य और सुगंध का धनी होता है। कृष्णलीला से जो भी परिचित है वे कदम्ब से भली भांति परिचित है। भक्तकवि रसखान ने लिखा है। ॥ जौ खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन॥ अर्थात यदि मुझे पक्षी बनाया होता तो में यमुना नदी के किनारे कदम्ब के पेड़ पर अपना घोंसला बनाता जहां भगवान श्री कृष्ण कदम्ब की डाल पर बैठकर बंशी बजाते थे। कदम्ब का पेड़ उत्तर भारत, मथुरा, वृंदावन, बिहार, मुम्बई आदि प्रांतों की रेतीली भूमि में स्वयंमेव उत्पन्न होते हंै। यह हल्का रूखा, स्वाद में कटू, कड़वा और कसैला तथा विषाक में कट और वीर्य में शीतल होता है। यह जिदोषहर, विषहर, रक्त समन, शोधहर, शुक्रशोधक, मूत्र विरजनीय, स्तन जनन, योनिदोषहर, कान्तिवर्धक, नाड़ी संस्थान, पोष्टीक और धातु वर्धक होता है। कदम्ब के फलों में बन्धयत्व का गुण होता है। माहवारी के पांच दिन पश्चात इसके फल शहद और जल के साथ तीन दिन पीने से स्त्री बन्ध्या हो जाती है। अनुसंधानीय विष्य है।
कदम्ब का औषधि में उपयोग
कदम्ब के फलों के रस से बच्चों में हाजमा ठीक होता है। इसकी पत्तियों के रस से अल्सर तथा घाव ठीक हो जाता है। आयुर्वेद में कदंब की सूखी लकड़ी से ज्वर दूर करने की दवा तथा मुंह के रोगों में पत्तियों के रस से कुल्ला करने का उल्लेख है। पशुओं के बाड़े में फूलों और पत्तियों को रखने पर कोई बड़ा रोग नहीं फैलता है। सांप का काटने पर कदम्ब की इलाज में काम आती हैं। इसकी जड़ मूत्र रोगों में लाभकारी है। इसके फलों के रस से मां का दूध बढ़ता है। जमना नदी के किनारे खड़े कदम्ब के पेड़ों की छाल विशेष गुण वर्धक होती है। सिरोही तहसील में ज्यादातर पेड़ मनोरा के तलाई नाड़ी में है। इसलिए उसे कदम्ब नाड़ी भी कहते है।
फलं कदम्बस्य च मक्षिकानी, लुषोदकेन जिरिनं निपीय।
स्नानावसाने नियमेन चापि, बन्ध्यामवश्यं कुरूते हठेन
सुरेश दाधीच , सेवानिवृत्त आयुर्वेद अधिकारी
Published on:
04 Feb 2017 10:24 am
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