
Increase Quality Of Basmati Rice
भागलपुर।
दशकों पुरानी सुगंधित धान की फसलें फिर से लहलहाएंगी। इससे नुकसान कम लेकिन उत्पादन अधिक हो सकेगा। भागलपुर विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक इस पर व्यापक शोध कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने नालंदा,बक्सर,कैमूर,कटिहार,पूर्णियां,चंपारण,बेतिया,गया पटना और भोजपुर में धान की पैदा होने वाली फसलों के नमूनों पर शोध करना शुरु किया है। कृषि वैज्ञानिकों का मकसद इन फसलों की लंबाई घटाकर इनके सुगंध को कायम रखना है। कृषि वैज्ञानिक डॉ मुकेश कुमार ने बताया कि धान की पुरानी फसलों में नालंदा का मालभोग,बक्सर-कैमूर का सोनाचूर, कटिहार-पूर्णिया का जसुआ, हफसाल बेतिया चंपारण का चंपारण बासमती, भागलपुर की कतरनी, मगध का कारीबाग और गया का श्यामजीरा नस्ल शामिल है।
मुकेश कुमार ने बताया कि कतरनी का काम अच्छा चल रहा है। उन्होंने बताया कि कतरनी की लंबाई 160 सेमी होती थी। इसे घटाकर 120 सेमी करने की योजना है। उम्मीद है कि 2020 तक बौनी कतरनी किसानों के पास होगी। कतरनी की खेती 160 दिनों में होती थी,इसे घटाकर 130-140 दिनों में लाया जा रहा है। यानी कतरनी एक माह पहले पैदा हो जाएगी। उन्होंने कहा कि इससे न सिर्फ भागलपुर बल्कि राज्य के दूसरे हिस्सों में भी कतरनी का उत्पादन बढ़ेगा।
Published on:
24 Sep 2019, 4:53 PM IST
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