भारत में प्रतिवर्ष 65 हजार टन रसायनों का उपयोग अधिक उत्पादन पाने के लिए किया जा रहा है। इस कारण पर्यावरण व स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो रही है। साथ ही मृदा की उर्वरक क्षमता कम होती जा रही है। रसायनों के अत्यधिक उपयोग से परागण करने वाली मधुमक्खियों की संख्या कम होती जा रही है। इससे फसल उत्पादन पर बहुत घातक प्रभाव पडऩे लगा है। जोबनेर कृषि विवि के डॉ. महेन्द्र मीना ने नई जैविक नैनो तकनीक का विकास किया है।
इस नैनो फॉर्मूलेशन की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने की वजह से पौधे में होने वाली बीमारियों से भी बचाव होता है। यह पूर्णतया बायोडिग्रेडेबल होने की वजह से पूरी तरह सुरक्षित एवं
क्या है नैनो तकनीक
जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बलराज सिंह ने बताया, यह नैनो फॉर्मूलेशन काइटोसन व हिस्टीडीन से मिलकर बना हुआ है। इसको बीज उपचार व छिड़काव के माध्यम से उपयोग में लिया जाता है। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होने के कारण पौधे की वृद्धि और विकास शीघ्र होता है। प्रकाश संश्लेषण अधिक होने से क्लोरोफिल की मात्रा बढ़ जाती है जिससे फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है।
नैनो फॉर्मूलेशन के फायदे
राजस्थान कृषि अनुसंधान केन्द्र, दुर्गापुरा के निदेशक डॉ. अर्जुन सिंह बलोदा ने बताया, इस जैविक नैनो तकनीक से एक हैक्टेयर भूमि में महज 192 ग्राम नैनो फॉर्मूलेशन का ही उपयोग करना पड़ता है। एक किलो फॉर्मूलेशन बनाने में केवल 1800 रुपए खर्च आता है, अधिक मात्रा में बनेगा तो इससे भी कम खर्च आएगा। इस तकनीक के उपयोग से देश में रासायनिक पदार्थों का उपयोग कम होगा एवं मानव को हिस्टीडीन युक्त फल-सब्जियां मिल पाएंगी। यह उत्पादन में वृद्धि के अलावा फलों को जल्दी खराब होने से भी बचाता है। जैविक नाइट्रोजन की वजह से फल-सब्जियों की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है। भारत सरकार से पेटेंट मिलने के बाद अब इस तकनीक पर बड़े पैमाने पर कार्य करने के लिए विवि को सरकार से बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट मिलने में भी मदद मिलेगी।
- सलाउद्दीन कुरेशी