
मानसून में यह फसलें किसानों को कर सकती हैं मालामाल
कमल ककड़ी
ठहरे हुए पानी में उगने वाले कमल के फूल के तने को ही कमल ककड़ी कहा जाता है। ऐसे में बारिश का मौसम तो कमल ककड़ी की खेती करने का सबसे उचित समय है। मानसून में इसकी खेती करके भरपूर मुनाफा कमाया जा सकता है। पौष्टिक गुणों से भरपूर कमल ककड़ी की बाजार में मांग भी बहुत रहती है। यह एक प्रकार की सब्जी है, जिसका अचार भी बनाकर उपयोग में लिया जाता है। इसके अलावा कमल के फूल और मखाना उगाकर अतिरिक्त कमाई भी की जा सकती है। करीबन एक एकड़ तालाब में कमल ककड़ी उगाने पर लगभग ५५ क्विंटल तक उत्पादन किया जा सकता है।
जामुन
जामुन की खेती करने के लिए भी बारिश का मौसम सर्वोत्तम माना जाता है। अच्छी बरसात के बीच जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में इसकी बागवानी करना लाभदायक होता है। इस मौसम में पौधे वातावरण् में नमी बनी रहती है, साथ ही मिट्टी भी काफी समय तक गीली रहती है। इससे पौधे बहुत जल्दी बढ़ते हैं। एक हेक्टेयर में जामुन के करीबन 250 पौधे लगाए जा सकते हैं। इसके बाद अगले 8 -10 सालों तक एक-एक पेड़ से 80 से 90 किलो तक जामुन का उत्पादन किया जा सकता है।
सिंघाड़ा
सिंघाड़े की खेती के लिये भी पानी की अत्यधिक मात्रा में जरूरत होती है। तालाबों में बारिश का पानी एकत्र कर सिंघाड़े की खेती की जा सकती है। ऐसे में बारिश के पानी में सिंघाड़े की पैदावार कम मेहनत में अच्छा मुनाफा दे जाती है। खेत में भी पानी भरकर सिंघाड़े की खेती की जा सकती है। अक्टूबर-नवम्बर से फसल पकना शुरू भी होने लगती है।
मशरूम
बारिश के मौसम में मशरूम की कई उन्नत किस्मों जैसे ऑयस्टर, मिल्की आदि की खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। इस मौसम में वातावरण शुष्क ना होकर नमी और आद्रता लिए होता है, जो मशरूम की खेती के लिए काफी अच्छा होता है। मशरूम की बढती मांग को देखते हुए महज एक लाख रुपए खर्च कर सालों साल अच्छी कमाई की जा सकती है। अक्सर मानसून में सड़क के किनारे या फिर गार्डन आदि जगहों पर मशरूम अपने आप उग जाते हैं। यह मशरूम जहरीले होते हैं, उपयोग में लेने लायक नहीं होते।
अनार
अनार की खेती करने के लिए भी बारिश का मौसम सबसे अच्छा रहता है। इसके लिये हल्की बलुई दोमट मिट्टी में कंपोस्ट डालकर जैविक विधि से खेत तैयार किए जा सकते हैं। वैसे तो अनार की खेती बहुत आसानी से हो जाती है, लेकिन बारिश के पानी को संचय करके सिंचाई करने पर अच्छी क्वॉलिटी के अनार की पैदावार होती है। इसकी खेती के लिये टपक सिंचाई की पद्धति सबसे कारगर मानी जाती है, जिसमें पानी और श्रम दोनों की बचत होती है। इसके बागों के प्रबंधन के लिए जैविक कीटनाशक और जीवामृत का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक बार फसल पक जाने पर हर चार से छह महीनों में अनार तोड़े जा सकते हैं।
Published on:
02 Aug 2023 02:44 pm
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