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खरपतवार से ऐसे बचाएं अपने खेतों को

खरपतवार फसलों के अंकुरण एवं वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसको खाने से पशुओं में अनेक प्रकार के रोग पैदा हो सकते हंै। इसे कई स्थानीय नामों जैसे गाजर घास, कांग्रेस घास, चटक चांदनी, कड़वी घास आदि से जाना जाता है।

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Kanchan Arora

Sep 16, 2023

खरपतवार से ऐसे बचाएं अपने खेतों को

खरपतवार से ऐसे बचाएं अपने खेतों को

मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर सर्वोत्तम समय
खरपतवार का मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर के आस पास पुष्पन पूरे जोरों पर होता है। इसको समूल नष्ट करने का सर्वोत्तम समय यही है। इसे उखाड़ते समय हाथों में दस्ताने एवं सुरक्षात्मक कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए।
खरपतवार से बनाएं कम्पोस्ट
खरपतवार के पौधों में फूल आने से पहले ही छोटी अवस्था में उखाड़कर कम्पोस्ट या वर्मी-कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है।
अगर उखाडऩा संभव न हो
- इसे बढऩे से रोकने एवं इसे खाकर नष्ट करने के लिए मेक्सिकन बीटल "जाइगोग्रामा बाइकलरेटा" नामक कीट बहुत उपयोगी है।
- ग्लाइफोसेट (1-1.5 प्रतिशत) और घास कुल की वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजर घास को नष्ट करने के लिए मेट्रीबजिन (0.3-0.5 प्रतिशत) या 2,4-डी (1-1.5 प्रतिशत) का स्प्रे किया जा सकता है।
-प्रतिस्पर्धी वनस्पतियों जैसे चकोड़ा (केसिआ टोरा), हिप्टिस, जंगली चौलाई, गेंदा आदि के द्वारा गाजर घास को विस्थापित किया जा सकता है।

चकोड़ा के बीजों का छिड़काव
प्रतिस्पर्धी वनस्पतियों जैसे चकोड़ा (केसिआ टोरा), हिप्टिस, जंगली चौलाई, गेंदा आदि के द्वारा गाजर घास को विस्थापित किया जा सकता है। अक्टूबर- नवम्बर में चकोड़ा के बीज एकत्रित कर फरवरी-अप्रेल में गाजर घास ग्रसित स्थानों पर छिड़काव कर देना चाहिए। वर्षा होने पर वहां चकोड़ा उगकर धीरे -धीरे गाजर घास को विस्थापित कर देता है।

गाजर जैसी पत्तियों के कारण पड़ा नाम
पारथेनियम खरपतवार की पत्तियां गाजर जैसी लगती हैं। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में इसे गाजर घास भी कहते हैं। यह 1.5 से 2.0 मीटर ऊंचाई का पौधा होता है। इसमें कई शाखाएं होती हैं। इसकी पत्तियों तथा तने पर छोटे-छोटे बालनुमा संरचनाएं पाई जाती हैं तथा सम्पूर्ण पौधा सफेद रंग के फूलों से आच्छादित रहता है। इस खरपतवार का विस्तार बीज द्वारा होता है। इसका अकेला पौधा 5000 से 25000 बीज बनाने की क्षमता रखता है। इसका बीज इतना हल्का होता है कि हवा पानी तथा अन्य मानवीय कृषि क्रियाओं द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैल जाता है।

- राजेन्द्र कुमार जैन