
AI becomes measure tools of economic devement of any countries in future
विकास का मॉडल
ताजा शोध रिपोर्ट बताते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद या कंपनियों के टर्नओवर को केवल परंपरागत पूंजी और श्रमशक्ति के बल पर बढ़ाना अब संभव नहीं रहा। विकास के ये कारक अब निष्प्रभावी होने लगे हैं। अब एआई टूल्स को वर्किंग कल्चर का हिस्सा बना कर ही उच्च विकास दर हासिल करना संभव है। वैश्विक स्तर पर विकसित और विकासशील देशों के सफलता के बदलते मानकों ने कारपोरेटर्स से लेकर स्टे्टसमैंस तक को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। एसेंचर ने 12 विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के विकास की गति को केंद्र में रखकर एक रिपोर्ट जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूंजी व श्रमशक्ति के बल पर दुनियाभर में विकास के कीर्तिमान स्थापित हुए। पर अब वही देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जो एआई पर जोर दे रहे हैं। इस मामले में विकसित देश कमजोर पड़ गए हैं।
क्यूं पड़े कमजोर
एआई टूल्स पर जोर न देने से विकसित देशों का सकल घरेलू उत्पाद पिछले कुछ दशकों से या तो स्थिर है या फिर उसकी गति रुक सी गई है। इन देशों के बिजनेस मॉडल अब विकास के मानक नहीं रहे। जापान, अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी आदि की अर्थव्यवस्था के मंदी के पीछे इन्हीं कारकोंं को जिम्मेवार माना गया है।
बदल गए पुराने मानक
अब पूंजी और श्रमशक्ति कारेाबारी मानदंड नहीं रहे। इसकी जगह एआई ने ले ली है। अब देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए इसी पर जोर देने की जरूरत है। अगर विकसित देश एआई पर जोर देंगे तो वो आर्थिक विकास की दर को 2035 तक बढ़ाकर दोगुणा कर पाएंगे। बशर्ते कि वो अपने यहां वर्किंग कल्चर भी उसी के अनुरूप विकसित करें। ऐसा न करने पर नवाचार के साथ रोजगार और तीव्र विकास के अवसरों से भी धीरे-धीरे दूर हो जाएंगे।
एआई कैसे करता है मदद
फैक्ट्रियों में में बहुत-सी मशीनें ऐसी होती हैं, जो एक ही काम बार-बार करती रहती हैं, लेकिन उन मशीनों को स्मार्ट नहीं कहा जा सकता। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस वो है, जो इंसानों के निर्देश को समझे, चेहरे पहचाने, ख़ुद से गाडिय़ां चलाए आदि यानी हर निर्णय लेने के लिए इंसान का मोहताज न रहे। आज एआई की मदद से आज बहुत से काम किए जा रहे हैं। नई दवाएं तैयार की जा रही हैं। नए केमिकल तलाशे जा रहे हैं। जिस काम को करने में इंसान को काफी वक्त लगता है, वे सारे काम इन मशीनी दिमागों की मदद से चुटकियों में निपटाया जा रहा है। बहुत से पेचीदा सिस्टम को चलाने में भी इनकी मदद ली जा रही है। यानी वह श्रम भी करता है और फैसलों के लिए इंसान का मोहताज नहीं होता। इससे न सिर्फ मानव श्रम बचता है, बल्कि इंसान अपना दिमाग अन्य काम में लगाता है।
एआई की रेस में कौन
एआई की रेस में ग्लोबल स्तर पर सरकारी एजेंसियों से ज्यादा निजी एजेंसियां सक्रिय हैं। फेसबुक ने हाल ही में वॉयस ओवर नाम से नया फीचर लॉन्च किया है। इस रेस में फेसबुक के साथ अमेजन, अल्फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट भी शामिल हैं। आईबीएम एआई के जरिए ग्राहक सेवा बढ़ाने पर पहले से ही काम कर रही हैं। कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं, जो अलगोरिदम पर काम कर रही हैं। इसके जरिए एटॉमवाइन नाम की कंपनी ने 6 मिलियन अमरीकी डॉलर का फंड हासिल करने में सफलता हासिल की है। आइबीएम वाटसन एआई पर 5 मिलियन अमरीकी डॉलर खर्च कर कंपनी के फ्रंट ऑफिस सेवा कारोबार को 150 बिलियन फ्यूचर मार्केट का विस्तार करने में लगी है। जापानी कंपनी सॉफ्टबैंक ने जापानी लैंग्वेज का एआई के जरिए करने के मकसद से आबीएम से करार किया है। आईबीएम और जानसन एंड जानसन पिछले साल से ही इस पर काम कर रही है। अमेजन ने क्लाउड सेवा के जरिए इसकी शुरुआत की है। गूगल ने रियलटाइम अनुवाद सेवा लॉन्च की है। गूगल ने हाल ही में बेंगलूरु बेस्ड भारत की एआई स्टार्टअप का टेकओवर किया है। इसके अलावा फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट ने एआई वेंचर भी लॉन्च की है। आॢटफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर भारत में सरकारी स्तर पर कुछ नहीं हो रहा है। स्टार्टअप इंडिया योजना के तहत कुछ नवाचार उद्यमियों ने इस पर काम शुरू किया है। इसमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट व अन्य विदेशी कंपनियों ने भी रुचि दिखाई है। भारत में एआई का केंद्र बेंगलूरु बनता दिखाई दे रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में ही है।
विकसित देशों की स्थिति
एसेंचर के एक शोध में बताया गया है कि अगर 12 विकसित देश एआइ्र्र के आधार पर नवाचार को बढ़ावा दें तो 2035 तक अर्थव्यवस्था को दागुना विकास दर तक पहुंचाने का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।
देश वर्तमान भविष्य
अमरीका 2.6 4.6
फिनलैंड 2.1 4.1
ब्रिटेन 2.5 3.9
स्वीडन 1.7 3.6
नीदरलैंड 1.6 3.2
जर्मनी 1.4 3.0
आस्ट्रिया 1.4 3.0
फ्रांस 1.7 2.9
जापान 0.8 2.7
बेल्जियम 1.6 2.7
स्पेन 1.7 2.5
इटली 1.0 1.8
Published on:
03 Sept 2017 11:58 am

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