जयपुर। “ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या” (ब्रह्म ही सत्य है संसार मिथ्या है) मंत्र का उद्घोष करने वाले शंकर स्वरूप जगतगुरु आदि शंकराचार्य का नाम आपने अनेक बार सुना होगा, परन्तु ऐसी बहुत सारी बातें हैं उनके बारे में जो हम नहीं जानते। आद्य शंकराचार्य का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी को केरल के कालपी गांव में शिवगुरु भट्ट व देवी सुभद्रा के पुत्र के रूप में हुआ, इनका नाम शंकर रखा गया। वे लगभग तीन वर्ष के होंगे तभी उनके पिता का देहांत हो गया, छह वर्ष की आयु में ही वे वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हो गए और आठ वर्ष की आयु में संन्यास ले लिया। छोटी सी आयु में उन्हें तत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई और गोविंद नाथ से संन्यास की दीक्षा ली।
भारत में मंदिरों और देवालयों की स्थापना का शुभारंभ उन्होंने किया। उन्होंने संपूर्ण भारत की यात्रा करते हुए भारत के चारों कोनों में चार मठों बद्रिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, शारदा द्वारका पीठ व गोवर्धन पीठ जगन्नाथपुरी की स्थापना की। छोटी सी आयु लगभग 33 वर्ष में देवलोकगमन से पूर्व उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचनाएं वेदों के भाष्य और उपनिषदों की टीकाएं लिखी। शंकराचार्य ने तत्कालीन विख्यात विद्वान मंडन मिश्र और उनकी पत्नी सहित अनेक विद्वानों को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया। भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के लिए आदि शंकराचार्य ने विशेष व्यवस्था की थी। जिससे भारत चारों दिशाओं में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत हो रूप से एकता के सूत्र में बंध सके।
धर्म और संस्कृति की रक्षा
आदि शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों को देश की रक्षा के लिए बांटा। इन अखाड़ों के संन्यासियों के नाम के पीछे लगने वाले शब्दों से उनकी पहचान होती है। उनके नाम के पीछे वन, अरण्य, पुरी, भारती, सरस्वती, गिरि, पर्वत, तीर्थ, सागर और आश्रम, ये शब्द लगते हैं। आदि शंकराचार्य ने इनके नाम के मुताबिक ही इन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां दी।
—आचार्य राजेश्वर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, संयुक्त भारतीय धर्म संसद