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हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह डॉ. रामविलास शर्मा ने गढ़े आलोचना और भाषाशास्त्र के  नए मानक

हिंदी आलोचना में डॉक्टर रामविलास शर्मा का नाम अपरिहार्य जैसा है। उनके बिना हिंदी भाषा, साहित्य, सांस्कृतिक इतिहास आदि का मूल्यांकन अधूरा है।

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lalit fulara

Oct 06, 2016

मज्कूर आलम
oped@in.patrika.com

हिंदी आलोचना में डॉक्टर रामविलास शर्मा का नाम अपरिहार्य जैसा है। उनके बिना हिंदी भाषा, साहित्य, सांस्कृतिक इतिहास आदि का मूल्यांकन अधूरा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही ऐसे आलोचक हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं।

अपनी आलोचना प्रक्रिया में वे केवल साहित्य को ही नहीं रखते, बल्कि समाज, राजनीति, इतिहास, अर्थ आदि सबको एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन सिर्फ लेखकीय कौशल जांचने के लिए नहीं किया, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह रही कि उस रचनाकार ने अपने समय को कितना जिया। उसके साथ कितना न्याय किया है। 10 अक्टूबर को उनका जन्मदिन है। इस मौके पर


उनके कृतित्व पर एक नजर...



भाषाशास्त्र पर शानदार काम


हिंदी भाषाशास्त्रीय चिंतन की परंपरा पर नजर डालें तो यह स्पष्ट दिखता है कि हिंदी भाषाशास्त्र के क्षेत्र में अधिकतर काम अकादमिक स्तर पर ही हुए हैं। एक-दो लोगों को छोड़कर सभी ने हिंदी भाषाशास्त्र पर पश्चिमी भाषाशास्त्रीय पद्धति को ही लेखन का आधार बनाया है। बीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर अंत तक हिंदी भाषाशास्त्र की परंपरा में कुछ नया जोडऩे की कोशिश कम ही हुई है, लेकिन डॉ. रामविलास शर्मा ने हिंदी भाषा चिंतन को उन पद्धतियों से बाहर निकाल कर एक मौलिक पहचान दी। उनका भाषा चिंतन और विवेचन ही हिंदी साहित्य को उनकी सबसे बड़ी देन है।



उर्दू- हिंदी एक भाषा


राम विलास शर्मा मानते रहे हैं कि हिंदी-उर्दू का विवाद राजनैतिक शक्तियों का खड़ा किया गया ड्रामा है। हिंदी और उर्दू मूलत: एक ही भाषा हैं। आगे चलकर दोनों घुल-मिलकर एक होंगी, बोलचाल की भाषा के आधार पर एक ही साहित्यिक भाषा का विकास होगा। न तो हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा है और न ही उर्दू मुसलमानों की। बुनियादी तौर पर तो ये दोनों एक ही भाषा के दो रूप हैं।


सशक्त कवि भी थे डॉक्टर शर्मा

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डॉ. शर्मा सिर्फ आलोचक और भाषावैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि बहुत अच्छे कवि भी थे। अज्ञेय के संपादन में छपी पत्रिका 'तार सप्तकÓ के भी कवि रह चुके हैं। उनकी कविताओं में भी उनके जीवन संबंधी दृष्टिकोण झलकता है। उनकी कविताओं में जीवन की सच्चाई व समाज दिखता है। अपनी कविताओं को उन्होंने भाववादी तत्वों से बचाए रखा है। मुक्तिबोध की तरह वे भी इसी दुनिया की बात करते हैं। जन साधारण की बातें करते हैं। उनके ही सुख-दुख से खुद को जोड़ते हैं। रामविलास शर्मा के जन-साधारण में ग्रामीण, खेतीहर किसान एवं प्रकृति, खेत, खलिहान की उपस्थिति स्पष्ट देखी जा सकती है। उनकी कविताएं माक्र्सवादी विचारधारा से पगी हैं और उन्होंने कविता को मुख्यत: अपनी सामाजिक-राजनीतिक भावनाओं को प्रकट करने का माध्यम बनाया है।


अलग तरीके से सोचते थे शर्मा


भाषाविज्ञान के क्षेत्र में डॉ. शर्मा की सोच परंपरागत भाषा वैज्ञानिकों से अलग है। उन्होंने भाषा वैज्ञानिक लेखन में मौलिक स्थापनाएं की हैं। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में माक्र्सवाद को लागू किया। उन्हीं के शब्दों में, 'माक्र्सवाद के अनुसार हर चीज परिवर्तनशील है और भाषा का कोई स्तर ऐसा नहीं है, जो परिवर्तनशील न हो।


अंग्रेजी के प्रोफेसर ने हिंदी को बनाया ताकत

डॉ. शर्मा ने अंग्रेजी भाषा में पीएचडी की, वे अंग्रेजी के ही प्राध्यापक थे, फिर भी उन्होंने हिंदी को अपने विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और इस तरह अपनी मौलिक रचनाशीलता से आज न केवल हिंदी जगत में अपितु भारतीय साहित्य में अप्रतिम साहित्यकार के रूप में विख्यात हैं। 'डॉ. शर्मा का यह दृढ़ विश्वास था, 'मैं किसी न किसी समय इस हिंदी सागर की गहराइयांं नापूंगा और सफल होऊंगा। आज हिंदी साहित्य में उनका स्थान देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका आत्मविश्वास कहीं से गलत नहीं था।


भाषा और समाज में है गहरा रिश्ता


रामविलास शर्मा का मानना था कि भाषा और समाज में घनिष्ठ संबंध है। 1961 में प्रकाशित उनकी ग्रंथ 'भाषा और समाजÓ सामाजिक संदर्भ में हिंदी के अध्ययन और अनुशीलन की पहली कोशिश थी। 1965 में उन्होंने लिखा, 'जब तक केंद्र की राजभाषा अंग्रेजी है, तब तक प्रदेशों की भाषाएं राजभाषा नहीं बन सकती। उन्होंने कहा, 'भाषा जनता के लिए है, जनता भाषा के लिए नहीं।Ó अभी तक हम हिंदी को जनता की भाषा कहते आए थे, लेकिन जनता का नब्बे फीसदी भाग हमारी इस हिंदी से अपरिचित है। अब समय आ गया है कि नब्बे फीसदी जनता शिक्षित होकर अपनी भाषा को पहचाने उसका रूप संवारने में हाथ बंटाए।

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