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करौली के मूंडिया की अनूठी है ढेला-डोलची होली

होली मनाने की अलग-अलग इलाकों में विभिन्न परम्पराएं प्रचलित हैं। इनमें करौली जिले के टोडाभीम क्षेत्र के मूंडिया गांव में ढेला-डोलची होली खेलने की अनूठी परम्परा है। धूलेण्डी के अगले दिन यह होली गुर्जर समाज के लोगों द्वारा खेली जाती है। इस होली को देखने और खेलने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। टोडाभीम के मूंडिया गांव की पट्टियों में इस होली को खेलने के लिए गुर्जर समाज की पांच पीढिय़ों के लोग सुबह से तैयारी शुरू कर देते हैं।

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करौली के मूंडिया की अनूठी है ढेला-डोलची होली

करौली के मूंडिया की अनूठी है ढेला-डोलची होली



होली मनाने की अलग-अलग इलाकों में विभिन्न परम्पराएं प्रचलित हैं। इनमें करौली जिले के टोडाभीम क्षेत्र के मूंडिया गांव में ढेला-डोलची होली खेलने की अनूठी परम्परा है। धूलेण्डी के अगले दिन यह होली गुर्जर समाज के लोगों द्वारा खेली जाती है। इस होली को देखने और खेलने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है।
टोडाभीम के मूंडिया गांव की पट्टियों में इस होली को खेलने के लिए गुर्जर समाज की पांच पीढिय़ों के लोग सुबह से तैयारी शुरू कर देते हैं। मूंडिया गांव में तीन पट्टियां (बस्ती) हैं जिनके चौकों में यह अलग-अलग आयोजन धूलेण्डी के अगले दिन होता है।
इन पट्टियों के चौक में अपने-अपने नेग (रिश्ते के अनुसार) की महिलाओं के साथ होली खेलने की परम्परा है। पुरुष मकानों की छत्तों पर से महिलाओं पर रंग की बौछार करते हैं जबकि नीचे चौक में एकत्र महिलाएं रंग फेंक रहे लोगों पर मिट्टी के ढेले फेंकती हैं। दोपहर में यह आयोजन पूरे यौवन पर होता है और शाम ४ बजे तक चलता है।
मूंडिया गांव की तीनों पट्टियों के चौकों के पास बने मकानों की छतों पर रखे ड्रमों में पानी भरकर रंग घोल दिया जाता है। वहीं जमीन पर महिलाएं मिट्टी के ढेले जमा कर लेते हैं। महिलाएं दो दिन पहले से ढेले जमा करना शुरू कर देती है। महिला और पुरुष अपने होली खेलने के लिए रिश्ते के अनुसार न्योता देकर भी बुलाते हैं।
सबसे पहले छावडी पट्टी के चौक में होली खेलना शुरू होता है। इसके बाद लोग जुलूस के रूप में बैण्डबाजे व डीजे के साथ नाचते-गाते गंाव के मुख्य मार्गो से होते हुए बैंसला पट्टी के चौक में पहुंच होली खेलते है। यहां के बाद खेडापट्टी में पहुंचकर होली का धमाल शुरू होता है। वहां भी इसी तरह होली खेली जाती है।
बुजुर्ग बताते हैं कि वर्षो से चली आ रही इस परम्परा को नई पीढ़ी भी जीवित रखे हुए हैं। अनेक नौकरी पेशा युवा इस होली के लिए दूर-दूर से आकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। कोई भी इस होली खेलने में बुरा नहीं मानता। सब खूब मस्ती करते हैं।

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