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मैं निश्चित रास्ते पर नहीं चलना चाहती थी, अपने रास्ते खुद बनाए: ऋचा मीना

आधी आबादी यानी महिलाओं की सोच को अखबार में उतारने के लिए पत्रिका की पहल संडे वुमन गेस्ट एडिटर के तहत आज की गेस्ट एडिटर अभिनेत्री ऋचा मीना हैं। आपकी फिल्म 'छेल्लो शो' (लास्ट फिल्म शो) ऑस्कर के लिए नामित की गई थी। वहीं इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। आपका मानना है कि सपने आंखों को नहीं, जिंदगी को चमक देते हैं।

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जयपुर

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Jaya Sharma

Dec 01, 2023

मैं पहले से निश्चित रास्ते पर नहीं चलना चाहती थी। मैंने अपने रास्ते खुद बनाए।

मैं पहले से निश्चित रास्ते पर नहीं चलना चाहती थी। मैंने अपने रास्ते खुद बनाए।

ऋचा मीना,

संडे गेस्ट एडिटर.

मैं पहले से निश्चित रास्ते पर नहीं चलना चाहती थी। मैंने अपने रास्ते खुद बनाए। उसके लिए कठिन परिश्रम किया। जो लड़कियां छोटे कस्बों-शहरों से हैं, अपनी पहचान बनाने के सपने देखती हैं, उनसे कहना चाहती हूं कि जीवन से आपको क्या चाहिए यह सिर्फ आप जानती हैं। आपके सामने दरवाजा है तो उसे खोलना भी आपको ही है। सपनों को पूरा करने के लिए अवसर खुद पहचानने होंगे। रास्ते खुद बनाने होंगे। उन्हें तय भी स्वयं करना होगा। गांव, कस्बों व छोटे शहरों में रहकर भी बड़े सपने देखे जा सकते हैं। उन्हें पूरा करने के लिए आपको खुद रास्ते बनाने होंगे। हो सकता है कि चीजें कई बार आपको खुश न करें, लेकिन प्रयास करना बिल्कुल न छोड़े। उसके साथ ही जीवन में आने वाली मुश्किलों से सीखते रहने की इच्छा अवश्य रखें। क्योंकि संघर्ष ही आपके अंदर आत्मविश्वास पैदा करता है।

ऋचा कहती हैं कि सपनों को पूरा करने में हो सकता है कि बाधाएं आएं, नया सफर, नया शहर हो। लेकिन विकल्पों में खोना नहीं है। मुश्किलें और बाधाएं आपको बहुत-कुछ सिखाती हैं। जिंदगी पाठशाला है जिससे आप बहुत कुछ सीखते हैं। बस आपके अंदर जानने-सीखने की इच्छा होनी चाहिए।

जो कभी ताने देते थे, आज तारीफ करते नहीं थकते

देवेन्द्र सिंह राठौड़
जयपुर. गांव व छोटे कस्बों की लड़कियां भी हर क्षेत्र में बेहतर कर सकती हैं। परिवार का सहयोग हो तो कोई उन्हें चैम्पियन बनने से नहीं रोक सकता। यह कहना है अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज प्राची सिंह का। भरतपुर से ताल्लुक रखने वालीं प्राची नौ अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं जिसमें तीन पदक अपने नाम कर चुकी हैं। वर्ष 2015 में तीरंदाजी में प्राची ने यूथ कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप में पदक जीता है। प्राची का कहना है कि वर्ष 2012 में दसवीं कक्षा की पढ़ाई के लिए पिता उधम सिंह ने उन्हें भरतपुर से मुरादाबाद भेजा था। जिस स्कूल में उनका दाखिला हुआ था, उसमें बच्चों को तीरंदाजी भी सिखाई जाती थी। बस वहीं से प्राची ने तीरंदाज बनने का सपना देखना शुरू किया।

उन्होंने बताया कि जैसे ही ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला लिया तो तीरंदाजी एकेडमी बंद हो गई। वे निराश होकर मुरादाबाद से वापस घर भरतपुर लौट आईं। खेल महंगा था क्योंकि धनुष भी काफी महंगा आता था। एक बार तो मन हुआ कि छोड़ दूं क्योंकि लोगों कहते थे कि यह भी कोई खेल है, क्या फायदा इसे खेलने का। लेकिन पापा ने मेरे मन की बात समझी। उन्होंने कर्जा लेकर मुझे जयपुर भेजा।

छोटे से काम से खड़ा किया बिजनेस
निशांत तिवारी
बिलासपुर. ग्राम मुढि़पार की अंजली बंजारे कम पढ़ी-लिखी हैं। इसके बावजूद अब वह लाखों रुपए की आमदनी कर परिवार का संबल बनी हैं। बेहतर जीवन और बच्चों को पढ़ाना उनका सपना था। हिम्मत जुटाकर अंजली ने बैंक से पहले 30 हजार लोन लेकर एक सिलाई मशीन लिया। उससे सॉफ्ट टॉय, बैग और घर में सजावटी सामान बनाने का कार्य शुरू किया। उसके बाद दुकानदारों ने उन्हें ऑर्डर देना शुरू कर दिया। कुछ रुपए इक_ा किया और फिर से 60 हजार रुपए लोन लेकर किराने की दुकान खोली। उसके बाद ई-रिक्शा खरीदकर अच्छा पैसा कमा रही हैं।

लोगों का विरोध सहा पर खेल से नाता नहीं तोड़ा

हितेश शर्मा
भोपाल. मैं स्कूल के कबड्डी, खो-खो सहित हर गेम में मेडल जीतती थी। जब थोड़ी बड़ी हुई तो कराते में दिलचस्पी बढ़ी, लेकिन गांव में कोई कराते कोच ही नहीं था। उस समय लगा कि कहीं सपना टूट तो नहीं जाएगा। यह कहना है कराते प्लेयर रीना गुर्जर का। स्कूल के दौरान तीन नेशनल खेले। रीना कहती हैं कि मेरी बहन ने मुझे समझाया कि सारे गेम्स के बजाय एक पर फोकस करो। बहन के साथ भोपाल आ गई उस दौरान परिवार के कई सदस्यों ने विरोध भी किया।