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दुनिया के पहले ‘मैनेजमेंट गुरू’ कृष्ण से सीख सकते हैं सफलता के ये आठ सूत्र

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। इसलिए कुछ लोगों को वर्तमान समय में गीता की प्रासंगिकता पर संदेह है। लेकिन वर्तमान में मनुष्य की अधिकांश समस्याओं को उनके प्रबंधन के जरिए हल किया जा सकता है।

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जयपुर

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Mohmad Imran

Aug 12, 2020

दुनिया के पहले 'मैनेजमेंट गुरू' कृष्ण से सीख सकते हैं सफलता के ये आठ सूत्र

दुनिया के पहले 'मैनेजमेंट गुरू' कृष्ण से सीख सकते हैं सफलता के ये आठ सूत्र

कृष्ण एक अवतार से कहीं ज्यादा एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु हैं जिन्हें उनके अचूक मैनेजमेंट मंत्रा (Management Mantra By Lord Krishna) के लिए जाना जाता है। अपने प्रत्येक स्वरूप में वे हर उम्र के व्यक्ति के लिए रोल मॉडल हैं। किसी भी लक्ष्य के प्रति उनकी रणनीति, प्रबंधन और साधनों को उपयोग करने की क्षमता हम सभी के लिए प्रेरणादायी है। आज कृष्ण जन्माष्टमी पर आइए जानें खुद दुनिया के पहले मैनेजमेंट गुरू कृष्ण से प्रबंधन के आठ सूत्र जो हमें जीवन में सफलता की ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।

01. अपना कमिटमेंट पूरा करें
कर्म के सिद्धांत में उनका गहरा विश्वास था। वे जानते थे कि उनके अवतार का मुख्य उद्देश्य कंस को मारकर वासुदेव और देवकी को मुक्त कराना है। अपने इस उद्देश्य को लेकर वे इतने प्रतिबद्ध थे कि बचपन से ही इसकी तैयारी करनी शुरू कर दी थी। महज 11 साल की उम्र में उन्होंने नंदगांव, यशोदा मैया, राधा, बाल सखाओं और बचपन की यादों को सिर्फ इसलिए अलविदा कह मथुरा का रुख किया कि वे अपने कमिटमेंट के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। हम कृष्ण से सीख सकते हैं कि हमें अपने वायदों को हर हाल में पूरा करना चाहिए। भले इसके लिए हमें कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

02. अपने ज्ञान को साझा करो
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो कुछ भी आपको पता है वह दूसरों से साझा करें इससे आपके ज्ञान में वृद्धि होगी। इसकी पहल अपनी ओर से करें किसी के आग्रह का इंतजार न करें। वे खुद सर्वज्ञ थे बावजूद इसके वे अपने विचारों को दूसरों के साथ बांटने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते थे। जब अर्जुन ने कौरवों संग युद्ध से मना कर दिया तो उन्होंने अपने ज्ञान को अर्जुन के साथ साझा करते हुए उन्हें युद्ध के वास्तविक उद्देश्य के बारे में बताया। उन्हीं की प्रेरणा से अधर्म पर धर्म की विजय पताका फहराई।

03. लक्ष्य से कभी मत भटको
कृष्ण के जीवन में तीन प्रमुख उद्देश्य थे और वे जीवन भर उन्हें पूरा करने के लिए ही लीलाएं करते रहे। उनका हर कदम, प्रत्येक विचार, हर युक्ति उन्हें अपने लक्ष्य के और करीब लेकर आती थी। वे तीन लक्ष्य थे- परित्राणं साधुनाम् यानि जन कल्याण, विनाशाया दुष्कृताम यानि बुराई और नकरात्मक विचारों को नष्ट करना एवं धर्म संस्थापना अर्थात जीवन मूल्यों एवं सिद्धातों की स्थापना करना। कृष्ण के इस व्यवहार से यह शिक्षा मिलती है कि एक प्रबंधक के तौपर हमारे लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट हों और हमेशा उसी पर ध्यान क्रेन्द्रित करें। अपनी इंन्द्रियों के हाथ में विचारों की डोर न दें।

04. रणनीतिक दृष्टिकोण रखें
गीता को जानने वाले इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि कृष्ण एक कुशल प्रमाणित रणनीतिकार हैं। उन्होंने अपने प्रबंध कौशल और रणनीति के बल पर ही पांडवों को विजयी बनाया। उनके पास हर समस्या के लिए विकल्प और अलग रणनीति थी। एक के विफल होने पर वे तुरंत प्लान बी पर काम करने लगते। उदाहरण के तौर पर उन्हें मालूम था कि दुर्योधन गदा युद्ध में भीम से ज्यादा योग्य है। उन्होंने सोची-समझी रणनीति के तहत गांधारी के सामने नग्न होकर जाने पर उन्हें टोका जिससे दुर्योधन जांघों पर कपड़ा लपेटकर सामने गया। दिव्य दृष्टि से गांधारी उसके शरीर को हीरे सा सख्त बना देती है लेकिन जांघों पर इसका प्रभाव नहीं होता जो अंत में दुर्योधन के अंत का करण बनता है।

05. श्रेष्ठ प्रबंधक बनिए
वे चाहते तो सिर्फ एक सुदर्शन चलाकर 18 दिन चलने वाले महाभारत के युद्ध को क्षण भर में समाप्त कर देते। लेकिन उन्होंने एक अच्छे शिक्षक के रूप में विश्व को धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए पांडवों को खड़ा किया। यह एक अच्छे प्रबंधक का सर्वश्रेष्ठ गुण है कि वह अपने पास मौजूद सभी साधनों और प्रतिभाओं का जन कल्याण एवं समाज के विकास में भरपूर उपयोग करे। 100 कौरवों के विरुद्ध कृष्ण जिस प्रबंधकीय कौशल के साथ पांच पांडवों का पथ प्रदर्शन किया वह मंत्रमुग्ध करने वाली है।

06. संबंधों के आधार पर पक्षपात न करें
चाहे अपने मामा कंस का वध करना हो, बलराम का विरोधकर पांडवों की मदद करना हो या पांडवों को युद्ध के लिए प्रेरित करना हो कृष्ण ने कभी संबंधियों और परिवार के लिए धर्म को नहीं छोड़ा। उन्होंने हमेशा न्याय के पक्ष में खड़े होकर अन्याय का विरोध किया। उनके प्रबंधन का यह नियम हमें सभी का विश्वासपात्र और सार्वजनिक सहमति प्रदान करती है।

07. सबके लिए प्रेरणा बनकर उभरें
प्रेरणा में बहुत ऊर्जा है जो अंसभव को संभव बनाने की क्षमता रखती है। अपनी लीलाओं और कृत्यों से उन्होंने हमेशा इस बात को सिद्ध किया है। इंद्र के विरुद्ध उन्होंने गोकुल के लोगों को प्रेरित किया और गोवर्धन पर्वत उठाकर उनकी मदद भी की। ऐसे ही पांडवों को जब भी निराशा देखा तो उन्ळोंने उनमें नई ऊंर्जा का संचार किया और हमेशा प्रेरित करते रहे। लेकिप वे सिर्फं उन्हें प्रेरित ही नहीं करते थे बल्कि उपाय भी सुझाते थे। यह एक सच्चे प्रबंधक का असली गुण होता है कि वह सिर्फ शब्दों से काम न चलाए बल्कि संसाधन भी उपलब्ध कराए।

08. हमेशा मृदु एवं सरल बने रहें
ईश्वरीय अवतार होने, राज परिवार और नंदगांव में समृद्ध घर में पालन पोषण के बावजूद वे हमेशा साधारण जीवन जीते थे। उनके व्यवहार में अहंकार नहीं था और सभी उनकी नजरों में एक समान थे। एक अच्छे प्रबंधक के लिए यह सबसे जरूरी गुण है क्योंकि सभी को आगे बढऩे का समान अवसर देना भी उसकी महती जिम्मेदारी है। इसलिए हमेशा सरल और मृदु भाषी बने रहिए। वे हमेशा 'आम लोगों के प्रिय' बनकर रहे और किसी विशिष्ट स्थान को कभी स्वीकार नहीं किया। यही वजह है कि आज उन्हें सारा विश्व पूजता है। राज परिवार का होने के बावजूद वे अर्जुन के सारथी बने।