
लघुकथा लेखन
लघुकथाएं
निर्बन्ध से आबन्ध
डॉ. रूचि शर्मा
'देखो निमिषा, मेरी बात मान लो, मत जाओ। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं। एक बार बस...। मैं किस तरह से तुम्हें समझाऊं? तुम्हारे सपने हमारे सपने हैं पर तुम्हें पता है ना कि पापा की तबियत कितनी खराब रहती है। इस भयानक कैंसर से लड़ते लड़ते अब उनके पास कुछ ही दिन बचे हैं। हमारी शादी के बाद से ही उनकी दिली इच्छा थी कि पोते या पोती का मुंह देख लेते पर मुझो बिजनेस में सेटल होते होते वक्त लग गया...हालांकि उन्होंने मुझा पर कभी इसका दबाव नहीं बनाया।'
उदास निमिषा की आंखों में अक्षत की बातें सुनकर सैलाब उमड़ गया। अब कुछ बोलने की ना तो उसकी हिम्मत बची थी और ना ही इसका सवाल था। कुछ दिन पहले ही अपनी कड़ी मेहनत और काबिलियत के दम पर उसे जॉब में कंपनी से ऊंचे पैकेज पर प्रमोशन और मुंबई पोस्टिंग का मौका मिला था। वह कुछ समय अपने करियर को देकर एक अच्छा मुकाम हासिल कर लेना चाहती थी पर एक पत्नी के साथ एक बहू होने का निर्बन्ध मानो नई जिम्मेदारियों के लिए उसका इंतजार कर रहा था।
'जैसी तुम्हारी मर्जी।' कहकर वह आंसुओं को रोकने का प्रयत्न करते हुए उठ कर जाने लगी तभी उसे सिर पर एक मजबूत और स्नेह भरे हाथ का स्पर्श महसूस हुआ। यह तो मम्मीजी थीं। उन्होंने खाना बनाते वक्त सब सुन लिया था। वह प्यार से बोलीं, 'तुम इस घर की बहू ही नहीं बेटी भी हो। तुम्हारी इच्छाएं, सपने और खुशी इस घर के हर व्यक्ति के भी उतने ही हैं जितने कि तुम्हारे। मैंने कल ही अक्षत के पापा से इस बारे में बात की थी। उन्हें ज्यादा ख़ुशी जब होगी जब तुम खुद खुश रहोगी।
एक परिपक्व, जिम्मेदार और आत्मनिर्भर मां अपने बच्चे का पालन पोषण बखूबी कर सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए तुम्हारा खुद को वक्त देना भी जरूरी है।' इतना सुनते ही निमिषा की आंखें हर्ष और सम्मान से डबडबा आईं। उसने मम्मीजी के पैर छूकर उन्हें प्यार से गले लगा लिया। संबंधों का निर्बन्ध अब प्रेम के एक सुन्दर और अटूट आबन्ध में बदल चुका था।
----------
चुनाव
कुलदीप पारीक
विशाल मध्यम वर्ग से आता था। कम्पनी की सहकर्मी शालिनी से उसने प्रेम विवाह किया था। मिलनसार शालिनी का व्यवहार विवाह के बाद बहुत बदल गया था। पुराना फर्नीचर बदलने से लेकर नई कार लाने तक की जिद्द करती रही। विशाल ने जैसे-तैसे सामंजस्य बिठाया। न चाहते हुए भी उसकी मांगे पूरी करने का प्रयास किया।
शालिनी घर का कोई काम नहीं करती थी। विशाल की मां नौकरानी की तरह घर का सारा काम कर रही थी।मां ने सब कुछ नियति के हाथों छोड़ दिया था। विशाल से यह सब कुछ देखा नहीं जा रहा था। वह मन ही मन घुटन महसूस कर रहा था।
एक शाम शालिनी पार्टी का कह कर गई थी। रात तीन बजे लौटी। मां ने उस समय तो कुछ नही कहा किन्तु सुबह समझााते हुए बोली-बहू यह सब अच्छे घरों को शोभा नही देता। इस पर शालिनी भड़क गई और विशाल से कह दिया कि इस घर में या तो मैं रहूंगी या तुम्हारी मां। बुढिय़ा को अभी वृद्धाश्रम छोड़ आना होगा।
विशाल के पैरों तले की जमीन खिसक गई। बहुत समझााया वह टस से मस नही हुई। आखिर विशाल ने हाथ जोड़ लिए, कहा-यदि तुम्हारा यही फैसला है तो मेरी भी सुन लो यहां मेरी मां ही रहेगी। तुम दूसरा रास्ता चुनने के लिए स्वतंत्र हो।मंा रसोई में सब कुछ सुन रही थी। भरी आंखों से पास आई और बोली-बेटा मेरा क्या मैं तो वृद्धाश्रम में जीवन काट लूंगी। मेरे कारण तुम अपना परिवार बरबाद मत करो। किन्तु विशाल अपने निर्णय पर अटल था। उसने मां का चुनाव कर लिया था।
------
वो मान गई
निरुपमा मेहरोत्रा
आज चेतना फिर रजत से नाराज होकर बोली, 'मैं अब तुम्हारी मां के साथ इस घर में नहीं रह सकती, देखो कैसे नंगे पैर सुबह से रसोई में खटर पटर मचाए हुए हैं। अगर तुम अपनी मां से अलग नहीं रह सकते हो तो बताओ, मैं ही अलग हो जाऊंगी।'
रजत अपनी हठीली आधुनिक पत्नी के आगे हाथ जोड़कर बोला, 'चेतना, अपनी जिद को छोड़ दो, मैं पापा के जाने के बाद अपनी मां को अकेला नहीं छोड़ सकता, देखो कैसे वह सुबह से उठकर रसोई का काम अकेले ही करती हैं और फिर तुम भी मेरे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो जितनी मां, मुझो दोनों का साथ चाहिए।'
फिर सहसा रजत खड़ा होकर बोला, 'अच्छा चलो, आज तुमको डॉक्टर को दिखाते हैं, इधर कई दिनों से ढीली लग रही हो।'
डॉ. स्वाति ने चेतना का चेकअप कर रजत को भी अंदर बुला लिया। दोनों डॉक्टर के सामने कुर्सी पर बैठे थे। वह बोलीं, 'चेतना बधाई हो, तुम मां बनने वाली हो, अपने को खुश रखना तभी तुम्हारा आने वाला शिशु स्वस्थ होगा।'
डॉक्टर ने पर्चा लिखकर रजत को पकड़ा दिया।
मां बनने के विचार से चेतना खुशी से खिल गई, अपने अजन्मे बच्चे के लिए मातृत्व भाव हिलोरे मारने लगा। सासू मां यह खुशी का समाचार सुनकर प्रसन्न हो गईं, वह हर पल चेतना का ध्यान रखतीं और भरपूर प्यार बरसाती थीं। इन सब घटनाक्रम में चेतना का घर छोडऩे का विचार कब उसे छोड़ गया, पता ही नही चला।
इधर रजत सोच रहा था कि उसके हाथ जोड़कर मनाने के कारण ये बहुत अच्छा हुआ कि वो मान गई।
------
सच्चाई
गोविन्द भारद्वाज
'अभी तक तुम बिस्तर पर ही बैठी हो...जरा बाहर की तरफ देखो, मां अकेली घर के काम काज में लगी है।' मेहुल ने पत्नी सुलेखा से कहा।
'तो क्या हुआ..उनका भी तो घर है..जल्दी उठकर दो-चार काम कर भी लिए तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा। वैसे भी मेरी मम्मी का फोन आ गया था..उनसे दो बातें क्या करना भी आपको बर्दाश्त तक नहीं हुआ।' सुलेखा ने मुंह फेरकर जवाब दिया।
'भाग्यवान जरा धीरे बोलो...मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूं... कहीं मां ने सुन लिया तो उन्हें बुरा लगेगा।' मेहुल ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
इतनी देर में मां ने किचन से आवाज़ दी,'बहू तुम्हारी मम्मी से बात खत्म हो गई हो तो, चाय ले जाओ..चाय तैयार है..।'
'मां आपको कैसे पता चला कि सुलेखा की मम्मी को फोन आ रहा था?' मेहुल ने पूछा। मां बोली,'बेटा! हर घर का हाल यही है..थोड़ी देर पहले मेरे पास भी उनका फोन आया था..।'
'आपके पास..इतनी सुबह-सुबह..सब खैरियत तो है ना..।' मेहुल ने चिंता जाहिर करते हुए कहा।
'बेटा! कल शाम को सुलेखा की भाभी नाराज होकर घर छोड़कर पीहर चली गयी है...उस बेचारी बुढिय़ा के माथे घर का सारा काम आ गया.. यही दुखड़ा सुनाने के लिए फोन किया था।'
मां ने स्पष्ट जवाब दिया। सुलेखा ने अपने घर की सच्चाई सुनी तो उसके तेवर ढीले पड़ चुके थे।
बड़ी खबरें
View Allखास खबर
ट्रेंडिंग
