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मुंशी प्रेमचंद जयंती विशेष; वो मास्टर आज भी जिंदा है’

धौलपुर. डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है। वही सीमेंट जो ईट पर चढ़कर पत्थर हो जाता है, मिट्टी पर चढ़ा दिया जाए तो मिट्टी हो जाएगा।साहित्य शिरोमणि प्रेम चन्द की लिखी ये पंक्तियां वर्तमान परिदृश्य में भी खरी उतरती है। मुंशी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880-8 अक्टूबर 1936) का जन्म वाराणसी से चार मील दूर लमही गांव में हुआ था। प्रेमचन्दजी की सादगी बयां करती इस फ़ोटो के लिए हरिशंकर परसाई ने मुंशी प्रेमचंद के जीवन के इस तथ्य को अपने व्यंग लेख

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Munshi Premchand Jayanti Special; That master is still alive.

मुंशी प्रेमचंद जयंती विशेष; वो मास्टर आज भी जिंदा है'

मुंशी प्रेमचंद जयंती विशेष; वो मास्टर आज भी जिंदा है'
धौलपुर. डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है। वही सीमेंट जो ईट पर चढ़कर पत्थर हो जाता है, मिट्टी पर चढ़ा दिया जाए तो मिट्टी हो जाएगा।
साहित्य शिरोमणि प्रेम चन्द की लिखी ये पंक्तियां वर्तमान परिदृश्य में भी खरी उतरती है। मुंशी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880-8 अक्टूबर 1936) का जन्म वाराणसी से चार मील दूर लमही गांव में हुआ था। प्रेमचन्दजी की सादगी बयां करती इस फ़ोटो के लिए हरिशंकर परसाई ने मुंशी प्रेमचंद के जीवन के इस तथ्य को अपने व्यंग लेख 'प्रेमचंद के फटे जूतेÓ में व्यक्त करते हुए लिखा है- 'पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं। दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है। जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है। मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूं फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी या नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी। इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।Ó
आज चकाचौंध के पीछे भागती युवा पीढ़ी को प्रेम चन्द जैसी दिव्य आत्माओं को अपना रोलमोडल बना उनकी सादगी, समर्पण और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण से प्रेरणा लेनी चाहिए। हिंदी साहित्य में अग्रणी स्थान रखने वाले उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जीवन सादा और संघर्षो भरा था। प्रेम चंद का बचपन अभाव और मुश्किल भरा था। जब वे पंद्रह साल के हुए, तब उनकी शादी कर दी गई और सोलह साल के होने पर उनके पिता का भी देहांत हो गया। 1910 में वह इंटर और 1919 में बीए के पास करने के बाद स्कूलों के डिप्टी सब इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। मुंशी प्रेमचंद शिक्षा विभाग के डेप्युटी इंस्पेक्टर थे। लेकिन महात्मा गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने अपनी नौकरी का त्याग कर दिया। हमेशा हमेशा के लिए गरीबी उसका दामन थाम लेती है। उनके बिना कलफ और बिना इस्तरी किए हुए कुर्ते के अन्दर से उनकी फटी बनियान झांकती रहती। एक बार उनके पैर की तकलीफ को देखकर डॉक्टर उन्हें नर्म चमड़े वाला फ्लेक्स का जूता पहनने को कहते हैं। पर उनके पास उन्हें खरीदने के लिए सात रुपए तक नहीं थे। तब वो अपने प्रकाशक को एक खत लिख कर उसमें विस्तार से अपनी तकलीफ बताकर सात रुपए भेजने की गुजारिश करते है। नौकरी छोडऩे के बाद वे पूर्णरूप से साहित्य सृजन में लग गए। उन्होंने अपना बाकी जीवन अनुवाद, संपादन और लेखन के जरिए धनोपार्जन करके यापन किया।
हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले मुंशी प्रेमचंद के अंतिम समय में उन्हें वो सम्मान नहीं मिल सका, जिसके वो हकदार थे। सारी दुनिया में साहित्य का अलोक फैलाने वाले मुंशी प्रेमचंद की अंतिम यात्रा भी गुमनामी में ही निकली।
प्रेमचंद की बेटे अमृत राय ने प्रेमचंद की जीवनी 'कलम का सिपाहीÓ में लिखा है 'उनकी अंतिम यात्रा के वक्त कुछ ही लोग वहां मौजूद थे। जिस समय अर्थी जा रही थी, तो रास्ते में किसी ने पूछा कि कौन था, तो साथ में खड़े एक आदमी ने कहा कि कोई मास्टर था, जो मर गया।Ó
उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रह। प्रेमचंद का जीवन गरीबी में ही प्रारम्भ हुआ और गरीबी में ही उनकी मृत्यु भी हुई। पर प्रेम चन्द जी को अपनी इस गऱीबी का कभी मलाल भी नहीं रहा उन्होंने खुद कहा कि 'लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है। जिन्होंने धन और भोग विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वो क्या लिखेंगेÓ
हिंदी साहित्य को एक नया आयाम देने वाले मुंशी प्रेमचंद भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं सदैव हमें बुराई से लडऩे, लोगों की सहायता करने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। हमें हमेशा याद दिलाती रहती हैं कि Óवो मास्टरÓ हमारे बीच आज भी जिंदा है।Ó किसी गरीब असहाय की पीड़ा में आज भी उसके जीवन्त दर्शन होते हैं। बहुत ही साधारण शब्दों में मुंशीप्रेम चन्द जी ने कहा था किसी राष्ट्र का साहित्य उसकी जागृति का मापदंड है। विज्ञान का छात्र रहने के बावजूद भी मुझे ये कहने में संकोच नहीं है कि साहित्य ही भौतिक जगत में एक मात्र साधन है, जो आत्मा को कांच की तरह साफ और बेदाग़ रख सकता है और इन्सान के अन्दर इंसानियत को जिंदा रखता है।