
कविता-मुझे खुद पर अभिमान चाहिए
दिशा शर्मा
ना ही चाहिए किसी पर आरोप, ना ही मेरे नाम का कोई त्योहार चाहिए।
मैं हूं प्रभु की कृति, अपनी आंखों में खुद के लिए सम्मान चाहिए।
ना ही चाहिए कोई सुरक्षा, ना ही कोई विशेषाधिकार चाहिए।
मैं हूं समर्थ, इस भाव का अहसास चाहिए।
ना ही चाहिए बदला समाज, ना ही कोई सुधार चाहिए।
मैं हूं शक्ति, बस मन में खुद के यह विश्वास चाहिए।
ना ही चाहिए कोई मसीहा, ना ही कोई आंदोलन का वार चाहिए।
मैं हूं पर्याप्त, बस इस स्व जागरण का साथ चाहिए।
ना ही चाहिए कोई उधार, ना ही कोई उपकार चाहिए।
मैं हूं संघर्ष, सक्रियता का उत्साह चाहिए।
ना ही चाहिए कोई करूण गाथा की नायिका का मान,
ना ही दया भाव चाहिए।
मैं हूं सृजिता, खुद से खुद की पहचान चाहिए।
ना ही चाहिए आक्षेप किसी पर, ना ही कोई आरोप का अवलंबन चाहिए।
मैंने कैसे ना प्रतिकार किया, खुद से इसका जवाब चाहिए।
ना ही चाहिए कोई परीक्षा, ना ही सम्मान चाहिए।
मैं हूं तुझसी ही, मुझे बस थोड़ी सी धरा थोड़ा सा आसमान चाहिए।
ना ही चाहिए रियायत कोई,ना साबित करने का दबाव चाहिए।
मैं हूं संपूर्ण, खुद में बस यह स्वीकार चाहिए।
स्त्रीत्व का चाहिए गौरव मुझे, मुझे खुद पर अभिमान चाहिए।
हां! स्त्रीत्व का चाहिए गौरव मुझे, मुझे खुद पर अभिमान चाहिए।
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कविता- प्रदूषण की धुंध?
ऋतु शर्मा
ना जाने क्यों?
अक्सर ही
इन तुहिन कणों की छांव में,
अजब सी धुंध की चादर लिए
सिमट- सिमट क्यों जाता है।
मेरा ये मासूम सा शहर!
इस अजब सी धुंध से
अलसायी सी धूप है .
मुरझाई सी सांझा है,
बावरी सी हो चली है निशा।
डूब गई हर गली,
डूब गई हर डगर .
डूब रहा क्यों मेरा
मासूम सा शहर
इस अजब सी धुंध में .
न जाने क्यों ?
घड़ी-घड़ी बढ़ रहे अंधियारे को,
घूंट घूंट हम पी रहे या जी रहे
चित्र सारे धुंधले धुधले
से हो गए
ज्यों किसी अजब नशे में
जी रहे
इस अजब सी धुंध से
पांव उठ ना पा रहे
ज्यूं हो थकन सी
बेबस आंखें झर रहीं
ज्यूं हो जलन सी
जिस सभ्यता की दे रहे
हैं हम दुहाइ
उसी पर छा रहे विपत्ति के
क्यो धुंधलके ?
न जाने क्यों ?
मेरा तुम्हारा यह शहर
चीख-चीख पुकारता।
गुजारिशें हैं कर रहे
खग पात और लता
सुरसा सा मुख फैला कर
धुंध बढ़ा आ रहा।
हौले हौले प्राणी हो विवश
क्यों इधर-उधर भागता?
न जाने क्यों ?
इस अजब सी धुंध को
अब और नहीं बढने दो
रोक लो,
इस काली धुंध को,
लेकर एक प्रण।
रोक लो!
इस प्रदूषण को
लेकर के एक प्रण।
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Published on:
19 Feb 2022 03:41 pm
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