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कविता-बारात

कविता

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कविता-बारात

कविता-बारात

रीना मेनारिया

गांव में पहली बार
मुकर गई कोई बेटी
मण्डप में बैठने से
और लौटना पड़ा
बिना दुल्हन के
बारात को
गली -मोहल्ले में
जितनी आंखें
उतने सवाल
जितने होंठ
उतनी बातें
कि आखिर कैसे लौट आई
बिना दुल्हन लिए बारात
पर कौन जाने कि
गांव में पहली बार
लिया था
किसी बेटी ने
अपने भविष्य का फैसला
अपने हाथ
तभी तो लौटी थी
बिना दुल्हन के बारात।।

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बेटी

कंधे पर टंगा पर्स
खूंटी टांग
वह आ बैठी मां के पास
दिन के हाल चाल
पूछकर फिर जा लगी
रसोई में और
चाय बना लाई दोनों के लिए
चाय सुड़कती मां बोली
काश तू बेटा होती
शाम को बेटी के हाथ से
दलिया खाती
मां फिर कहती
काश तू बेटा होती
बेटी मुस्कुरा दी
माथा गूंथती
बेटी के हाथों को
सहलाती,चूमती
वह फिर कहती
काश तू बेटा होती
गीता के श्लोक
सुनाती बेटी को
मां फिर कहती
काश तू बेटा होती
बेटी बोली-
मां! मैं बेटा होती
तो शायद तू
कहीं और होती
मां के मुंह से शब्द उछले
हां शायद वृद्वाश्रम।
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घटी

घर की घटी
जो पीसती थी
सैर-सवा सैर आटा
हर रोज
सूरज की किरणें फैलें
उससे पहले ही
घटी अपने थाल में
फैला चुकी होती थी
पूरे परिवार का
पेट भर जाए
उतना आटा
सूरज और घटी में
यह रोज की
होड़ थी मानों
बड़ा स्नेह था
पत्थर की इस घटी से
दादी जो
पेट जाए सा प्रेम करती
वह घटी से
आखिर पूरे घर का
पेट जो भरती
वह पत्थर की घटी।।
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चौक
अब तो घर
पक्का हो गया था
मां को मिल गई थी निजात
अक्सर चौक लीपने और
दीवारें पोतने से
सज चुके थे कमरे
महंगे फर्नीचर से
अब कोई नहीं पूछता
इस कच्चे चौक को
फिर भी दादी
हर पर्व -त्योहार पर
लीपती है चौक को
मांडती है मांडने
भौजाई कहती
दादी क्यों थकती हो
बेकार में
क्यों हाथ खराब करती
मिट्टी में
दादी कहती
तेरे महंगे पक्के घर से
कहीं अधिक कीमती है
यह चौक क्यूंकि
मेरे पोते-पोतियों की
जन्म स्थली है
यह चौक।।