
कविता-नारी: तुम श्रेष्ठ थी, हो, रहोगी
डॉ. शैलजा एन भट्टड़
तुम श्रेष्ठ थी, हो, रहोगी।
इस बात का मान रखो।
अपने उठते कदमों से
अपने होने का सम्मान करो।
कोई ऐसा क्षेत्र नहीं,
जहां तुम्हारा हस्तक्षेप नहीं।
संगीत हो या हो खेल,
राजनीति हो या फिर एवरेस्ट।
अपना परचम लहरा आई हो।
नारी हो, नारी का मान बढ़ाई हो।
कोमलता गर गहना है
वीरता को तुमने पहना है।
कभी अहिल्याबाई,
तो कभी मैरीकॉम
बन जाती हो।
कभी अरुणिमा बन,
एवरेस्ट चढ़ जाती हो।
नभ से दूरी भी कम कर आई हो।
कल्पना, सुनीता बन,
देश का मान बढ़ाई हो ।
नारी हो हर किरदार,
खूब निभाई हो।
हाशिए से मुख्य पृष्ठ पर आई हो।
पतझड़ भी बसंत बनाई हो।
बावजूद इसके कि,
गम का पर्याय कहलाई हो।
हर रोल बखूबी निभाई हो।
तुम्हारा व्यक्तित्व ही,
तुम्हारी पहचान है।
तुम हो विश्व का गौरव,
तुम्हें शत-शत प्रणाम है।
नारी के हक से जीती हो।
मर्यादा खूब समझती हो।
परिस्थिति विकट बने ,
पहले ही हल ढूंढ लाती हो।
आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति बन,
सबकी मन:स्थिति मजबूत बनाती हो।
स्त्री पर और कविता पढि़ए
स्त्री तेरी कहानी
जितेन्द्र कुमार गौतम (जिद्दी जीतू)
स्त्री सहती है हंसते रोते,
सारे गम जिंदगानी के,
हो जाएंगी फना भी मगर,
दिल में दर्द नहीं होता।
दिन रात गुजरते हैं इनके,
पुरुषों बच्चों की खिदमत में,
पूस की रात का भी उनका,
मौसम सर्द नहीं होता।
भरी भीड़ में औरत की,
जब आबरू उतारी जाती है,
इंसानों की बस्ती में,
तब कोई मर्द नहीं होता ।
पुरुषों ने अपने जीवन में,
महिलाओं सा दर्द सहा होता,
तो शायद ये पुरुष वर्ग,
इतना बेदर्द नहीं होता।
पुरुष प्रधानता की पोथी में,
गर स्त्रियों का सन्दर्भ नहीं होगा,
तब तक महिलाओं को,
पुरुषों पर गर्व नहीं होगा ।
पुरुष, स्त्रियों को जब तक,
वाजिब सम्मान नहीं देंगे,
इस अनसुलझो पावन रिश्ते में,
प्यार का पर्व नहीं होगा ।
बिन औरत, मर्द जात का,
होता कोई वजूद नहीं,
परिवार मुकम्मल हो कैसे,
जहां स्त्री मौजूद नहीं।
Published on:
01 Mar 2022 10:34 pm
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