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कविता-मरूस्थल की आन और बान

कविता

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कविता-मरूस्थल की आन और बान

कविता-मरूस्थल की आन और बान

सुनील कुमार महला

मरूस्थल की आन, बान और शान हूं
मैं शमी (खेजड़ी) हूं...!
वैशाख,जेठ की तपती दुपहरी में
लू के थपेड़ों को सहकर
मैं डगमगाती नहीं
हरितिमा से ओतप्रोत,
सावन के सपने मुझ में हैं
क्योंकि
मैं बन जाती हूं,
रेगिस्तानी प्राणियों का कड़ी धूप में
सहारा...!
ढ़ोर बुझा लेते हैं जठराग्नि
मेरी लूंग (हरे छोटे पत्ते) से,
मेरे मींझर (फूल)
बढ़ाते शोभा मरू की,
मेरे फल सांगरी की सब्जी की बात निराली है,
शादी-ब्याह में,
चाव से ढ़ूढ़ी जाती,
स्वाद से भरपूर
सांगरियों की सब्जी आज मिलती कहां है ?
तपते सूरज की गरमी से सांगरियां,
बन जाती जब खोखा...!
सूखा मेवा हो जैसे...आदमी हो या ढ़ोर
सबकी जबान पे चढ़ जाते मेरे खोखे...!
मेरी जड़ से हलधर बना लेते हल,
मेरी लकड़ी से बने हल की नोंक से
लिखी जाती फिर इस मरूधरा की तस्वीर,
लिखे जाते यहां गीत खुशहाली के
मैं शमी हूं...!
याद है! छपनिया अकाल में भी
जीने का मैं शमी वृक्ष ही बनी थी,
मनुष्य मात्र का एकमात्र सहारा,
तब
मेरी छाल को खाकर जिंदा रहे थे मनुष्य...!
मैं जानती हूं दर्द, नहीं मैं बे-दर्द
मरूस्थल की इन हवाओं से
गूंजते तूफानों से,
मैं लड़ी हूं, भिड़ी हूं
मैं शमी हूं...!
मैं जानती हूं, पहचानती हूं हरेक दर्द
मरू की दुनिया के...!
मरू होना बांझ होना है, बंजर होना है
लेकिन
जब तक मैं हूं... मेरे अस्तित्व से
बना रहेगा
ऐ मानव! तुम्हारा भी अस्तित्व...!
तुम तो ऐ मानव !
दशहरे के दिन मुझे पूजते हो,
मेरी अनेक औषधीय विशेषताएं हैं...!
यज्ञ में भी मैं (मेरी लकड़ी) काम आती हूं,
मीठे धोरों का मैं चूमूं गाल
मैंने मरू धरती का रस पीया
मरू खातिर ही मैं जीवित हूं
आंखों में मेरे सपने नाचे,
बादल मेरे संग-संग हैं भागे
मैं मरू की अलगोजे सी गूंज,
मैं मरूभूमि का शृंगार, मरूधर देश में...!
तुम्हें क्यों नहीं है मेरी दरकार ...?
कैसे भुला सकते हो तुम?
मेरे बलिदान को...?
मैं शमीं कर रही आह्वान पर आह्वान
छपनिया में गर
मैं नहीं बुझाती तुम्हारी जठराग्नि, ऐ मरूवासी
अस्तित्व नहीं होता शायदतुम्हारा...!
क्या होता तुम्हारा गर मैं नहीं होती?
क्या तुमने कभी सोचा है, समझाा है?
मेरे होने का मतलब?
तुम जिंदा हो तो
यह परोपकार मेरा है तुम पर
और आज तुम हो गए हो..
निर्दयी, निर्लज्ज...!
विकास और तकनीकी के इस दौर में
तू ऐ मानव! हो गया है स्वार्थी, लालची
चला रहा है मुख पर आरी, कुल्हाड़े...!
कंक्रीट की दीवारों ने रौंद डाला है
मेरे अस्तित्व को
लेकिन याद रख, यह तेरा विकास नहीं है,
यह विनाश है
कोरा विनाश, सत्यानाश...!
गर मुझे दर्द होगा
तो यह दर्द वास्तव में तेरा दर्द है...!
चलते चलते बस इतना जरूर याद रखना
मैं शमी हूं, मैं जीवन श्वास हूं, मरू पारिस्थितिकी की जान हूं...!
युगों युगों से इस मरूधर की पहचान हूं...!