
इस जीवन से पूर्व भी जीवन था और इस जीवन के बाद भी जीवन रहेगा, ऐसी आशा, आकांक्षा व आस्था मानव की सदियों से रही है। इसके पीछे अनेक मान्यताएं-आस्थाएं हैं जो भौतिकवादियों की चुनौतियों व आपत्तियों के रूप में विद्यमान रही है। गीता में भगवान कृष्ण ने जो कुछ कहा और अपना विराट स्वरूप दिखाया, वह उस कालचक्र का ही प्रमाण है जो जीवन को एक निश्चित क्रम से संचालित कर पुन: उसी परमात्मा में विलीन होने तक की यात्रा से जुड़ा है, जिस परमात्मा के अंश के रूप में वह जन्म लेता है और जीवन प्रारम्भ करता है। इन सब तथ्यों का प्रामाणिक दस्तावेज ही परामनोविज्ञान की वह शोध है जिसे डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत ने आजीवन किया, जिया और जिसके निष्कर्ष तक ले जाकर जीवन को जानने की प्यास रखने वालों को वे परोस गये।
07 जनवरी 1936 को राजस्थान के ब्यावर में जन्मे डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत परामनोविज्ञान पर प्रामाणिक शोधकर्ता के रूप में विश्वभर में प्रसिद्घ है। उनके द्वारा 100 से अधिक प्रकरणों पर शोध करने और 500 से अधिक मामलों को सूचिबद्घ करने का एक ठोस आधार है जिसके निष्कर्ष पूरी तरह विज्ञान की कसौटी पर कसे जा सकते हैं। उनके द्वारा 'पुनर्जन्म-एक वैज्ञानिक विवेचना' विषयक शोध पर उन्हें जुलाई 1987 में राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की गई। इस शोध में उन्होंने अपने स्वयं द्वारा किये गये अध्ययनों तथा उनसे प्राप्त अनुभवों व निष्कर्षों को तो सम्मिलित किया ही है। साथ ही इस क्षेत्र में विश्वभर में किये गये अन्य शोधकर्ताओं के अनुसंधानों की भी विवेचना की है जिनसे पुनर्जन्म की मान्यता को खारिज नहीं किया जा सकता। इस बात को अनेक प्रकरणों के अध्ययन तथा विज्ञान की अनेक आपत्तियों पर कसकर परखा जा चुका है और वे तार्किक भी है। लिहाजा मृत्यु के पश्चात जीवन की संभावना को लेकर अब किसी तरह के संशय की गुंजाइश भी नहीं रहती है।
डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत को इस विषय के प्रति आकर्षण बचपन में ही पैदा हो गया जब उनके दादा स्व. गणेशराम रावत की मानसिक क्षमताओं के बारे में उन्होंने कहानियां सुनना शुरू किया। उनके दादा जब 11 वर्ष के थे, तभी वे एक साधु खाकी बाबा के यहां मिलने गये जहां अक्सर उनके परिवार के लोगबाग आया-जाया करते थे। साधु ने उनके दादा से एक दिन कहा था कि वह (साधु) तीन दिन बाद अपना चौला (शरीर) बदल देगा और 12 साल बाद राजा के रूप में फिर प्रकट होगा तथा उस समय उनके दादा (गणेशराम रावत) उनके दीवान होंगे। साधु खाकी बाबा की कही बात सच निकली और उन्होंने तीन दिन बाद अपना शरीर त्याग दिया तथा करीब 12 साल बाद राजस्थान के डूंगरपुर रियासत के महाराजा के दरबार में राजकीय मामलातों की देखरेख केलिये एक मंत्री परिषद का गठन किया गया जिसमें उनके दादाजी को 'दीवान' नियुक्त किया गया क्योंकि तब राजा वयस्क नहीं थे, लिहाजा परिषद प्रमुख को ही राजकीय फैसले लेने होते थे। इस कहानी से यह स्पष्ट जाहिर होता है कि साधु ने मृत्यु के बाद फिर जन्म लिया और उसका कहा अक्षरश: सही निकला।
जीवन की निरन्तरता के क्रम में मृत्यु के बाद जीवन के अस्तित्व तथा संभावना को लेकर प्रकट की जाने वाली जिज्ञासाओं को परामनोविज्ञान की शोध से जुड़े अनेक मामलों से आसानी से समझा जा सकता है। डॉ. रावत ने वर्जिनिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्घ परामनोवैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेंसन सहित कई अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के साथ काम किया है, जिन्हें परामनोविज्ञान के अध्ययन पर एक अग्रणी विशेषज्ञ माना जाता है।
डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत द्वारा जिन पुनर्जन्म संबंधी प्रकरणों का अध्ययन किया गया उनमें अधिकांश अध्ययन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इनमें से तीन प्रमुख प्रकरणों का विवरण यहां पाठकों केलिये प्रस्तुत है जो काफी चर्चित हुए और विश्वस्तर पर उनका सत्यापन भी किया गया था।
1. शांतिदेवी
शांतिदेवी का प्रकरण परामनोविज्ञान व पुनर्जन्म संबंधी मामलों का एक रोचक व मजबूत तथ्यों पर आधारित प्रकरण है जिसे विश्व के कई शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया और स्वयं महात्मा गांधी ने भी जिसकी प्रामाणिकता परखने के लिये 15 सदस्यों की एक टीम को भेजकर इसकी पूरी जांच कराई जिसमें तत्कालीन सांसद और 'तेज' समाचार-पत्र के पूर्व सम्पादक देशबंधु गुप्ता, प्रसिद्घ एडवोकेट ताराचंद माथुर तथा राष्ट्रीय नेता पं. नेकीराम शर्मा आदि भी शामिल थे। 24 नवम्बर 1935 को शांतिदेवी को साथ लेकर यह दल ट्रेन से दिल्ली से मथुरा के लिये रवाना हुआ और इस समिति के प्रमुखों ने जो कुछ देखा, परखा व पाया उसके निष्कर्षों को बाद में अनेक समाचार-पत्रों ने कवरेज किया।
शांतिदेवी का जन्म 11 दिसम्बर 1926 को दिल्ली के चीरा खाने मौहल्ले में बाबूरंग बहादुर माथुर के यहां हुआ। करीब 4 वर्ष की आयु में जब उसने बोलना शुरू किया तो उसकी बातें हैरान करने वाली थी। उस चार वर्ष की बच्ची ने तब अपने पति और बच्चों के बारे में बताना शुरू कर दिया और कहा कि उसके पति दिल्ली से 145 किमी दूर मथुरा में रहते हैं जहां द्वारकाधीश मंदिर के सामने उनकी एक दुकान है और उनका एक बेटा भी है। उसने यह भी कहा कि वह चौबिन अर्थात चौबे की पत्नी है और उसका नाम लुगदी बाई है। एक दिन दूर के रिश्तेदार बाबू बिशनचन्द जैन ने शांति से कहा कि अगर वह अपने पति का नाम बताये तो वह उसे मथुरा ले जायेगा। इस प्रस्ताव से आकर्षित होकर उसने बाबू बिशनचंद के कान में फुसफुसाया कि उसके पति का नाम पं. केदारनाथ चौबे है।
इसके बाद केदारनाथ चौबे को एक पत्र लिखकर शांति द्वारा दिये बयानों का ब्यौरा लिखते हुए उनसे पुष्टि कराई। पत्र पढ़कर पं. केदारनाथ चौबे अपने माता-पिता के साथ दिल्ली पहुंचे और शांति से मिले तो शांति ने उन्हें तुरंत पहचान लिया। शांति की यह कहानी देशभर के मीडिया ने उत्सुकता से कवर की।
शांति ने अपने पति की पहचान के लिये तीन प्रमुख बाते बताई जिनमें (1) उनका रंग गोरा है, (2) उनके गाल पर कान के पास बांई तरफ एक बड़ा मस्सा है और (3) पढ़ने के समय कभी-कभी चश्मा लगाते हैं। यह तीनों बातें सही निकली।
12 नवम्बर 1935 को केदारनाथ अपनी तीसरी पत्नी और अपनी दूसरी पत्नी लुगदी से उत्पन्न पुत्र नवनीत लाल के साथ दिल्ली पहुंचे तो शांति के सामने जानबूझकर उसके पति केदारनाथ का गलत परिचय कराया और उसे केदारनाथ का बड़ा भाई बताया। लेकिन शांति ने केदारनाथ को देखते ही अपना सिर शर्म के मारे झुका लिया और एक तरफ खड़ी हो गई। जब उससे पूछा कि वह शरमा क्यूं रही है तो उसने धीमे स्वरों में कहा-'ये मेरे पति के बड़े भाई नहीं, ये मेरे पति ही हैं।' शांति ने अपनी जेब से पैसे निकालकर दो पान मंगवाये फिर उनमें से एक केदारनाथ और दूसरा नवनीत को दिया तथा अपनी माँ से खाना बनाने का आग्रह करने लगी। माँ ने पूछा-'क्या बनाऊँ?' तो शांति ने कहा- 'इनको आलू के पराठे और काशीफल की सब्जी बहुत पसंद है।' पं. केदारनाथ चौबे यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि वाकई उनकी पसंद यही थी।
उस रात केदारनाथ ने दिल्ली में रंग बहादुर माथुर के घर पर ही आराम किया। रात्रि में सोने से पूर्व केदारनाथ ने शांति से आगे बात करने का आग्रह किया। किन्तु इससे पहले कि वे प्रश्न करते शांति ने उनसे सवाल कर डाला, 'तुमने इससे शादी क्यों कर ली?' (तब केदारनाथ के साथ उनकी तीसरी पत्नी भी थी।) 'क्या हमने यह तय नहीं किया था कि तुम फिर से शादी नहीं करोगे?' केदारनाथ ने मौन रहते हुए अपना सिर झुका लिया। बाद में उन्होंने कुछ प्रश्न किये और सुबह स्पष्ट कहा-'हम दोनों के बीच की एकदम निजी गोपनीय बातें मेरी पिछली पत्नी लुगदी ही जान सकती थी, इसलिये इस बारे में मुझे जरा भी शंका नहीं है कि शांति ही मेरी पिछली पत्नी है।' 15 नवम्बर को जब अपनी तीसरी पत्नी व बेटे नवनीत के साथ केदारनाथ मथुरा लौटने लगे तो शांति बड़ी बेचैन हो गई और बार-बार आग्रह करने लगी कि उसे भी उन लोगों के साथ जाने दिया जाये। लेकिन माता-पिता राजी नहीं हुए।
2. स्वर्णलता मिश्र
मध्यप्रदेश के छतरपुर में एम.एल. मिश्र की बेटी स्वर्णलता बचपन में कहती थी कि उसका घर कटनी में है और उसके दो बेटे हैं। पहले तो सबने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद वह बार-बार यही बात बोलने लगी तो उसके पिता उसे कटनी ले गये जहां स्वर्णलता ने पूर्व जन्म के अपने दोनों बेटों को पहचान लिया। उसने और भी बहुत सारी चीजों को बताया जो सिर्फ उन बेटों की मां ही जान सकती है। उन दोनों ने बताया कि 18 साल पहले उनकी माँ बिंदियादेवी की मौत दिल की धड़कनें बंद हो जाने से हो गई थी।
स्वर्णलता का जन्म 02 मार्च 1948 को शाहपुर जिला टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) में हुआ था। पिता मनोहरलाल मिश्र उस समय छतरपुर में जिला स्कूल निरीक्षक कार्यालय में सहायक पद पर नियुक्त थे। जब स्वर्णलता कोई तीन-साढ़े तीन वर्ष की थी, तब एक दिन वे उसे अपने साथ दौरे पर जबलपुर ले गये, लौटते समय जब वे कटनी के निकट पहुंचे, तो बालिका स्वर्णलता ने, जिस ट्रक में वे यात्रा कर रहे थे, उसके चालक को एकाएक एक ओर इशारा करते हुए कहा-'उधर मोड़ लो ड्राइवर साहब! उधर...उधर मेरा घर है।' मिश्रजी को आश्चर्य हुआ कि यह बच्ची क्या कह रही है? यह तो आश्चर्य में डालने वाली बातों के सूत्र का एक सिरा ही था, उस समय कौन जानता था कि इसी शृंखला की बातें इसे विश्व के परामनोविज्ञान साहित्य में अमर कर देगी?
कुछ देर बाद जब सभी कटनी में चाय भी रहे थे, बालिका ने कहा-'मेरे घर चलते तो वहां बढ़िया चाय मिलती।' घर लौटने पर एम.एल. मिश्र ने पाया कि स्वर्णलता अब अक्सर ही परिवार के अन्य बच्चों से यह कहने लगी कि वह कटनी के एक पाठक परिवार की सदस्या है। वह पाठक परिवार के संबंध में अनेक सूचनाएं देने लगी। धीरे-धीरे स्वर्णलता ने अपने भाई-बहिनों व माता-पिता को अपने कटनी में कथित पूर्व जन्म की बातों का विवरण दिया।
उसने बताया कि कटनी में उसका एक बहुत बड़ा मकान है, वह सफेद रंग का है, उसके दरवाजे काले हैं, उसके पीछे लड़कियों का एक स्कूल हैं, उसके मकान से रेलवे लाइन दिखाई देती है और पास ही चूने के भट्टे भी हैं। बाद में जांच-पड़ताल के दौरान इन सूचनाओं के आधार पर उसके मकान को पहचान लिया और 1958 में राजस्थान विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. हेमेन्द्रनाथ बनर्जी ने भी इस प्रकरण को जांचा-परखा।
जब स्वर्णलता करीब 10 वर्ष की थी तो छतरपुर में संस्कृत व्याख्याता राजीव लोचन अग्निहोत्री की पत्नी को देखकर बोली, 'चाची! तुम पहले बहुत सुन्दर थी, अब वैसी नहीं हो।' स्वर्णलता ने यह भी कहाकि 'तुम मेरे साथ गाँव में गई थी न, जहां शौचालय की बहुत तकलीफ थी, मैदान में जाना-पड़ता था।' अग्निहोत्री को याद आया कि करीब 15 वर्ष पूर्व वास्तव में वे 'बीया चाची' के साथ तिलोरा गांव, उनके भाई की शादी में गई थी और वहां इस प्रकार की असुविधा का उन्हें सामना करना पड़ा था। स्वर्णलता से और पूछताछ करने पर उसने अपने पूर्वजन्म की अनेक बातों का विवरण दिया।
1961 में विश्वविख्यात परामनोवैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेंसन ने भी स्वर्णलता का गहराई से अध्ययन किया। डॉ. स्टीवेंसन ने विश्वभर के पुनर्जन्म के सैकड़ों वृतांतों का अध्ययन किया है। इस शोध पर आधारित अपनी पहली पुस्तक 'ट्वन्टी कैसेज सजेस्टिव ऑफ रीइंकार्नेशन' में भारत के जिन 07 प्रकरणों का उल्लेख है, उसमें स्वर्णलता का प्रकरण भी है।
3. राधा
राजस्थान के ब्यावर से करीब 10 किलोमीटर दूर सराधना गांव में एक लड़की राधा जब ढ़ाई साल की थी और बोलना शुरू किया ही था तो उसने अपने आपको सोहनी बताया। सोहनी पास के गांव झाड़ली में जन्मी थी और जब वह 15 साल की थी तो अपनी मौसी के गांव दिसम्बर 1971 में सराधना गई जहां कुछ मवेशियों को चराते वक्त पेड़ की शाखाएं और पत्तियां काटते हुए वह गिर पड़ी और गंभीर रूप से घायल हो गई। उसके सिर पर ललाट से करीब दो इंच दूर एक नुकीले पत्थर से लगी घातक चोट ने उसकी जान ले ली। इस घटना के करीब 9 माह बाद अगस्त 1972 में सराधना में ही जूरी नामक महिला ने एक लड़की को जन्म दिया जिसका नाम राधा रखा गया। राधा ढाई साल की थी और बोलना शुरू किया तो उसने अपने आपको झाड़ली गांव की सोहनी बताया।
एक बार खाना खाते समय राधा ने और सब्जी की मांग की तो उसकी माँ ने उसे और सब्जी देने से मना कर दिया इस पर राधा गुस्सा हो गई और उसने अपनी माँ जूरी को धमकाया कि 'मुझे और सब्जी नहीं दी तो मैं अपने गांव झाड़ली चली जाऊंगी।' इसके बाद राधा ने और भी कई ऐसी बाते कही जिन्हें सुनकर उसकी माँ व घर के अन्य लोगों को हैरानी हो गई। यहां तक कि राधा ने अपनी मृत्यु कैसे हुई, इस बारे में भी जानकारी दी।
राधा का यह प्रकरण बेहद रोचक है और इसकी खास बात यह भी है कि राधा ने न केवल अपने पिछले जन्म में सोहनी होने की प्रमाणिक जानकारी देकर चौंकाया बल्कि उसने अपनी मौसी के सपने में आकर पहले से ही जूरी के यहां पुन: जन्म लेने की जानकारी दे दी। मतलब जूरी की संतान राधा न केवल सोहनी के रूप में जन्मी बल्कि इसकी पूर्व जानकारी भी उसने अपनी मौसी को देकर सबको चौंकाया और राधा के सिर पर जन्म के समय से ही उस चोट का निशान था जो सोहनी के रूप में मवेशियों केलिये डालियां काटते समय पेड़ से गिरने से हुआ और सिर में चोट लगने से जो मौत की वजह बना था। सोहनी के सिर पर मृत्यु के समय जो निशान था, वही राधा के जन्म के समय उसके सिर पर पाया गया।
डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत ने इस प्रकरण को 1981 में और बाद में 1986 में अध्ययन किया और वे सराधना में राधा और उसके रिश्तेदारों से तथा झाड़ली में सोहनी और उसके रिश्तेदारों से मिले। झाडली में सोहनी की माँ हंजा ने राधा द्वारा अपने पिछले जीवन के बारे में दी गई जानकारी की पुष्टि की। उसने यह भी कहाकि उसने पहली बार राधा को देखा तो उसका चेहरा सोहनी से काफी मिलता-जुलता था।
इस तरह डॉ. रावत ने पुनर्जन्म संबंधी करीब 100 से अधिक मामलों का अध्ययन कर कई तरह के तथ्यों को एकत्रित किया और पाया कि ऐसे मामलों में दोनों जन्मों के व्यक्तियों की स्मृतियां व आदतें समान हैं और उनके चेहरे तथा उसपर कोई चिन्ह आदि भी अगले जन्म में मिला। हालांकि ऐसा सब प्रकरणों में होना जरूरी नहीं लेकिन अपने पिछले जीवन की यादों, जानकारियों, भावनाओं का प्रकटीकरण होना अपने आपमें महत्वपूर्ण है। पुनर्जन्म की परिकल्पना के संबंध में डॉ. रावत के पास जो वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हुए उनसे इस सिद्घांत को स्वीकार करने के पर्याप्त वैध आधार पाये गये। स्वयं डॉ. रावत का कहना था कि उनके द्वारा एकत्रित किये गये सभी विशाल और प्रभावशाली साक्ष्यों के आधार पर 'पुनर्जन्म की परिकल्पना अब स्वीकार्य हो सकती है।' उनके द्वारा लिखित एक दर्जन पुस्तकों तथा सैकड़ों लेखों व शोध प्रतिवेदनों में इस बात की विस्तृत विवेचना हुई है।
(परोमनोवैज्ञानिक डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत की व्यापक शोध का निष्कर्ष)
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