हाईकोर्ट ने जन सुविधाओं को सुगम बनाने के लिए कई आदेश और निर्देश दिए, अफसरों को पालना में देरी के लिए फटकारा भी, लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ
अमित वाजपेयी
स्कूलों में मनमानी फीस, तय समय बाद भी टोल वसूली, अवैध निर्माण, अनियंत्रित यातायात, अनियोजित विकास और शहरों में पसरी गंदगी... ऐसे तमाम विषय हैं, जिनसे जनता रोज दो-चार होती है। जनता की सुनवाई करना शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी है। यही तो तंत्र है। जब तंत्र ही बे-लगाम हो जाए तो लाचार जनता कहां जाए। कुछ जागरूक लोगों ने जनहित याचिका की मदद से अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालतों ने जनहित में निर्णय भी किए लेकिन अफसरों ने उन्हें भी हवा में उड़ा दिया।
इसकी एक लंबी सूची है। हाईकोर्ट ने जन सुविधाओं को सुगम बनाने के लिए कई आदेश और निर्देश दिए। अफसरों को पालना में देरी के लिए फटकारा भी लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि उन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। अफसर भले ही जनता की सुनवाई न करे लेकिन नेता की जी-हुजूरी करता है तो मौज में है। नेताओं को भी जनता से ज्यादा भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने की चिंता है। भ्रष्ट अधिकारियों की पहचान छिपाने का फरमान भी इसी नीयत से जारी किया गया था। सब जानते थे कि देर-सवेर आदेश तो वापस लेना ही पड़ेगा।
देशभर में राजस्थान की छवि कलंकित करके हासिल क्या हुआ? बस कुछ समय के लिए भ्रष्ट अफसर प्रसन्न हो गए। शासन और प्रशासन उन्हें यह संदेश देने में कामयाब हो गया कि हम तो तुम्हारी पहचान गुप्त रखना चाहते थे लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। दरअसल भ्रष्ट अफसरों को राजी रखने के लिए ठीकरा कोर्ट के सिर फोडऩे की कोशिश की गई। शासन-प्रशासन को अदालतों के आदेश की पालना कराने की चिंता होती तो आज मध्यम वर्गीय परिवार निजी स्कूलों की मोटी फीस चुकाने का दंश नहीं झेल रहा होता। क्या मजाल होती कि प्रभावशाली लोग झील-तलाब या बांध की जमीन पर कब्जा करके फार्म हाउस बना लेते।
प्रशासनिक तंत्र यदि अदालतों के आदेश की पालना करने की मंशा रखता है तो सबसे पहले जनहित में आए तमाम फैसलों की पालना करनी चाहिए। अदालतों के ऐसे कुछ फैसले आपके सामने हैं, जिन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। निजी स्कूलों में फीस नियंत्रण का मुद्दा 20 साल में 4 बार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। फीस निर्धारण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पहले आदेश दिया, लेकिन अब तक पालना नहीं हुई। मास्टर प्लान के तहत बसावट के लिए हाईकोर्ट ने पांच साल पहले आदेश दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई तो भी उसकी पालना अब तक नहीं हुई।
रामगढ़ बांध के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण के मामले में हाईकोर्ट ने 11 साल पहले प्रसंज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के लिए जल संसाधन, राजस्व, पंचायतीराज व जयपुर विकास प्राधिकरण और नियम विरुद्ध किए गए आवंटनों को रद्द करने के लिए राजस्व मंडल को निर्देश दिए। अतिक्रमण के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने भी राहत नहीं दी। इसके बावजूद अधिकारी कुछ किसानों के निर्माण तोडऩे से आगे नहीं बढ़े।
आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक निर्माण रोकने व परकोटा क्षेत्र में पुरानी हवेलियों की जगह बहुमंजिला इमारत बनाकर उनका व्यावसायिक उपयोग रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से कई आदेश हो चुके। सुप्रीम कोर्ट ने एम्पावर कमेटी भी बनाई। इसके बावजूद शासन और प्रशासन के स्तर पर इसकी पालना नहीं हुई।
जयपुर शहर की सफाई व्यवस्था के लिए 10 साल पहले 13 दिशा-निर्देश दिए, लेकिन अब तक इस पर सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए। राज्य में आरटीई के तहत प्री-प्राइमरी कक्षाओं में प्रवेश के लिए हाईकोर्ट आदेश दे चुका लेकिन दो साल में एक भी बच्चे को प्रवेश नहीं दिया। हाईकोर्ट ने सात साल पहले नौकरियों में दो साल के परीवीक्षाकाल के लिए बनाए नियमों को रद्द कर दिया। इसके बावजूद आदेश की पालना नहीं हुई। हाईकोर्ट अब्दुल रहमान मामले में जल इकाइयों को पुरानी स्थिति में बहाल करने का आदेश दे चुका, लेकिन पालना नहीं होने से अनेक जल इकाइयां सूखी पड़ी हैं।
ऐसे में अब जरूरी है कि जिस तरह अफसरों ने अदालत के एक निर्णय की मनगढ़ंत व्याख्या करके भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने का दुस्साहस किया था, उसी फुर्ती के साथ अब जनहित के मुद्दों पर कोर्ट से हुए फैसलों की भी पालना की जाए।