
आज की भी हकीकत है मंटो की कहानियां
ए म.ए. करने के उपरान्त भी मंटो नाम मेरे जेहन में कहीं भी नहीं कुलबुला रहा था। अब तक मैं प्रेमचंद, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश सहित आला दर्जे के कथाकारों को पढ़ चुका था। कहानियां लिखने का सिलसिला जाने कब चल निकला पता ही नहीं चला। जिस दिन पहली कहानी छपकर आई संयोगवश उस दिन मैं मुंबई में 'हिंदुस्तानी जबान' के कार्यक्रम में शिरकत कर रहा था। यह लगभग नौ साल पहले की बात है। उस कार्यक्रम में उर्दू अदब के एक बड़े फनकार के मुंह से मंटो का नाम सुना था। बातों- बातों में उन्होंने कहा 'देखो भाई, यदि तुम्हें अच्छा कहानीकार बनना है और कहानी की भाषा-शैली की जमीन को खुद ही तोडऩा है तो, मेरे ख्यालात से तुम्हें मंटो को पढऩा चाहिए। जिससे कहानी की जुबान में कसावट आए।'
उस दिन सआदत हसन मंटो नाम पहली बार मेरे जेहन में दौड़ा। इसके बाद मैंने मंटो की कहानियां तथा उन पर लिखी कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें पढऩा शुरू की। प्रत्येक पुस्तक के पीछे वाले कवर पर मंटो की तस्वीर बनी हुई थी।..... थोड़ा चौड़ा माथा, आंखों पर गोलाकार फ्रेम वाला ऐनक, चेहरे पर कुछ उदासी के भाव, कुछ मायूसी के भी..। मैंने मंटो को पढ़ा, पढ़ता ही गया। मंटो निराले कथाकार थे। मंटो को पढ़कर मुझो आश्चर्य हुआ कि ऐसी शख्सियत मेरे जेहन में देरी से क्यों अवतरित हुई। खैर, देर आए, दुरस्त आए।
मंटो की रचनाओं की गिनती शायद उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी महत्वपूर्ण बात यह है कि मंटो ने इतने बरस पहले जो कुछ लिखा उसमें आज की हकीकत सिमटी नजर आती है और इस हक़ीकत को मंटो ने ऐसी तल्ख़ जुबान में पेश किया कि समाज के अलंबरदारों की नींद खराब हो गई।
मंटो जीवन के बयालीस बसंत में ही हमसे रुखसत हो गए, पर लगभग बीस वर्ष के लेखन में हिन्दी उर्दू कहानी का ऐसा स्तम्भ खड़ा कर गए, जो आज तक सलामत है। उनकी पढ़ी कहानियों में 'काली शलवार', 'ब्लाउज', 'ठण्डा गोश्त', 'धुआं', 'बाबू गोपीनाथ', 'नया कानून', 'यजीद','टोबा टेकसिंह', 'बू', 'खुदा की कसम', 'बांझा' समेत कई ढ़ेर सारी कहानियां हैं। इनमें कई कहानियां विवादित रही। 'बू' ने तो उन्हें अदालत तक घसीट लिया था।
मंटो के पास स्थायी तथा निश्चित काम-धंधा नहीं था। उन्हें हमेशा आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। मंटो ने कई दिन तंगहाली में बिताए, फाके किए। मंटो आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी रूह उनकी कहानियों में धड़कती है। उन्हें यदि चेखव तथा ओ. हेनरी की जमात में शामिल किया जाए तो यह अतिश्योक्ति न होगी। यह इत्तेफाक था कि जब मंटो का इंतकाल हुआ तब उनकी लिखी फिल्म-'मिर्जा गालिब' दिल्ली में हाउसफुल जा रही थी।
बहरहाल, मंटों पर 'वारिस अल्वी' द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तक मेरे हाथ में है, उसी में नजरें गड़ाए बैठा हूं। उम्मीद है, आने वाली नस्लें भी उन्हें बड़े चाव से पढ़ेगी। सम्भव है, फिर से कोई ऐसा कहानीकार अवतरित हो! डॉ. सोहन वैष्णव

Published on:
06 Jun 2018 01:18 pm
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