
कहानी
डॉ. मोहनलाल गुप्ता
शारदा बेचैन है। बार-बार करवटें बदल रही है। थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर जाकर देख आती है, कितनी रात बाकी रही है। झाौंपड़े में सन्नाटा है। पास में ही उसका पति मदन बेसुध होकर सोया पड़ा है। दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद, शाम को खाना कम और दारू ज्यादा। इसके बाद पूरा झाौंपड़ा कच्ची शराब की गंध से भर जाता है। शारदा को कच्ची दारू की गंध तनिक भी नहीं भाती किंतु पिछले पच्चीस सालों से इस तेज गंध को झोलते रहने के कारण अब उसे इस गंध से उतनी परेशानी नहीं होती जितनी उन दिनों में होती थी, जब वह ब्याह के बाद इस झाौंपड़े में आई थी।
एक कौने में चारों बच्चे बेखबर सोए पड़े हैं, अपने बाप की ही तरह पूरा शरीर बिखेरकर। गहरी नींद में किसी को खबर नहीं कि हाथ कहां है और पैर किधर! तीसरे कोने में ससुर का भी वही हाल है। उसका शरीर भी दारू से जर्जर हो रहा है। हाथ-पैर कांपते हैं, जीभ लडख़ड़ाती है, टीबी का मरीज है किंतु दारू पिए बिना गुजर नहीं।
शारदा उठकर झाौंपड़े से बाहर आती है। सचमुच आज की रात उसके लिए काफी लम्बी है। चंद्रमा जरूर अपने स्थान से थोड़ा हिला है किंतु तारे तो वहीं के वहीं, अड़े हुए हैं। शारदा झाौंपड़े के बाहर पत्थर पर बैठ जाती है। कौन जाने कल का दिन उसके मन की मुराद पूरी करने वाला ही हो! उसके दिल में उम्मीद बंधती है....... किंतु आज तक तो जीवन में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे देखकर यह लग सके कि उसके मन की मुराद पूरी भी हो सकती है......किंतु ग्रामसेवक स्वयं आकर शारदा के दस्तखत लेकर गया है और कहकर गया है कि कल पंचायत समिति में आ जाना तुम्हें पक्का मकान बनाने के लिए पचास हजार रुपए मिलेंगे। मकान में पक्का शौचालय बनाने के लिए बत्तीस सौ रुपए अलग से मिलेंगे। खुद मंत्रीजी जयपुर से चलकर आएंगे, गरीबों को चैक देने।
शारदा फिर आश्वस्त होती है। यदि मंत्रीजी आए तो अवश्य ही पचास हजार रुपए का चैक मिल जाएगा। कब से शारदा के मन में यह आस है कि उसके बच्चों के सिर पर उनकी अपनी पक्की छत हो। शारदा का ससुर भीखाराम गांव की गलियों में झााड़ू लगाते-लगाते बूढ़ा हो गया किंतु परिवार को पक्की छत तो दूर,़ कभी झाौंपड़े के लिए नया तिरपाल भी नसीब नहीं हुआ जो बरसात में झाौंपड़े को टपकने से रोक सके।
शारदा का पति मदन भी जिंदगी भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद कभी पक्की छत का सपना नहीं देख सका। सपना देखता भी कैसे, वह तो जो कुछ भी कमाता था, हर शाम दारू की भेंट चढ़ जाता था। आज से तीन साल पहले इंदिरा आवास योजना में जब शारदा का नाम आया था, तब शारदा को कुछ आस बंधी थी कि देर सबेर ही सही किंतु उसे पक्का मकान बनाने के लिए रुपए मिल जाएंगे किंतु जिस गति से पिछले तीन सालों में सूची में नाम आगे सरक रहे थे, उससे उसकी आस बार-बार कमजोर पड़ जाती थी। जब वह गांव के लोगों के मुंह से सुनती कि इस सूची में लिखे नामों को मकान मिलने में बीस-बाईस साल लग जाएंगे तो उसका रहा-सहा धैर्य जवाब दे जाता।
कभी-कभी निराश होकर वह अपने घास-फूस के झाौंपड़े में गूदड़ी में मुंह छिपाकर रो पड़ती....... किंतु इन आंसुओं की इस बेरहम संसार में कोई कीमत नहीं थी........... कीमत होना तो दूर, इन आंसुओं को कोई देखने वाला तक न था........करे तो क्या करे? जाए तो कहां जाए? फूस की छत बरसात को रोक नहीं पाती। सर्दी की रातों में दांत किटकिटा जाते और गर्मियों की दुपहरी में झाौंपड़े में लू बरबस घुस आती।
अब तो खैर बच्चे काफी बड़े हो गए किंतु जब बच्चे छोटे थे, तब वह काम के लिए मदन के साथ झाौंपड़े से निकलती तो उसका कलेजा किसी अनहोनी की आशंका से कांपता रहता। आए दिन वह सुनती कि झाौंपड़ी में बच्चे और बकरियां जल मरे तो उसका कलेजा मुंह को आ जाता। फिर भी उसे अपने छोटे बच्चों को झाौंपड़ी में बिना किसी सहारे के छोड़कर, मजदूरी करने पति के साथ जाना ही पड़ता।
कुछ दिन पहले उसने सुना कि सरकार गांवों के गरीब लोगों को मकान बनाने के लिए रुपया देगी तो मन के किसी कोने में आशा का अंकुर एक बार फिर फूट पड़ा था। उसने इधर-उधर पूछताछ की। सरपंच साहब ने बताया कि हां उन्होंने भी अखबार में पढ़ा है कि सरकार गरीब लोगों के मकान बनाने के लिए चौंतीस सौ करोड़ रुपए का कर्ज लेगी। इस कर्ज से राज्य में रह रहे गरीबों के लिए दस लाख मकान बनाए जाएंगे। कर्ज का नाम सुनकर शारदा एक बार फिर मुरझाा गई। कर्ज लेंगे तो चुकाएंगे कैसे? किंतु जब सरपंच साहब ने बताया कि यह कर्जा सरकार स्वयं चुकाएगी, गरीबों को नहीं चुकाना पड़ेगा तो शारदा की जान में जान आई। यह एक ऐसी सूचना थी जिसे सुनकर शारदा का दिल बल्लियों उछल गया।
कुछ दिन और बीते। गांव के लोगों में यह चर्चा आम हो गई कि सरकार गरीबों को मकान बनाने के लिए पचास हजार रुपया देगी। शारदा भी इस चर्चा को सुनती और आकाश की ओर देखकर मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करती कि हे भगवान, यह खबर सच्ची निकले। इसमें किसी तरह की दूसरी बात पैदा नहीं हो। पहले भी कितनी ही बार उसने इस तरह की बातें सुनी थीं किंतु वे केवल बातें ही बनकर रह गई थीं। कहीं इस बार फिर किस्मत उसी तरह धोखा न दे जाए। उसके मन में डर घर कर गया था।
आखिर वह दिन भी आया जब ग्रामसेवक उसका फार्म भरवाने और बैंक में खाता खुलवाने के लिए आया। ससुर भीखाराम ने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया था।
'शारदा कहां है?' ग्रामसेवक ने भीखाराम से पूछा। ग्रामसेवक के मुंह से अपना नाम सुनकर शारदा के कान खड़े हो गए।
'झाौंपड़े में ही है,क्यों? भीखाराम ने उलटकर सवाल किया।
'कागज घर की औरत के नाम बनेंगे। ग्रामसेवक ने कहा।
'औरत के नाम क्यों?' शारदा के ससुर भीखाराम ने गुस्से से पूछा।
'औरत के नाम इसलिए ताकि मरद उस मकान को बेचकर दारू न पी जाएं।' ग्रामसेवक ने हंसकर जवाब दिया।
'दारू! मैं दारू कहां पीता हूं!' भीखाराम ने आदत के अुनसार जवाब दिया। ससुर का जवाब सुनकर शारदा को हंसी आ गई।
'हां, मुझो पता है, तू दारू नहीं पीता। इस गांव में कोई दारू नहीं पीता।' ग्रामसेवक ने भी हंसकर जवाब दिया जिसे सुनकर भीखाराम भी झौंप गया।
'लेकिन घर का मालिक तो मरद ही होता है, क्या सरकार अब औरतों को घर का मालिक बनाएगी?
' यदि मरद यू हीं दारू पीते रहे तो एक दिन सारे घरों की मालिक औरतें हो जाएंगी। चल शारदा, अंगूठा लगा।' ग्रामसेवक ने मुंह बिगाड़कर जवाब दिया।
शारदा को मानो अब भी अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं आया था। जाने क्यों उसकी आंखों से रुलाई फूट पड़ी। इस संसार में जब आदमी फूटी हुई किस्मत लेकर आता है तो उसे चारों ओर से धक्के ही खाने पड़ते हैं। इसलिए उसे किसी अच्छी बात पर जल्दी से विश्वास भी नहीं होता। शारदा का अब तक का अनुभव तो ऐसा ही रहा था।
अब तो फार्म भी भरा जा चुका था। खाता भी खुल गया था। फिर भी शारदा के मन में आशंका बनी रही। वह आए दिन पंचायत के दफ्तर जा पहुंचती- 'कब आएंगे, हमारे मकान बनाने के पैसे।'
'सबर कर। जल्दी आएंगे।' ग्रामसेवक हंसकर जवाब देता।
'आ तो जाएंगे?' शारदा का अगला सवाल होता।
'हां जरूर आ जाएंगे। सरकार ने हुडको से साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए उधार लिए हैं। तीन सालों के भीतर-भीतर दस लाख मकान बनेंगे।'
'तीन सालों में!' शारदा अधीर हो उठती।
'हां, तीन सालों में।' इतना कहकर ग्रामसेवक अपने काम में लग जाता। शारदा फिर डर जाती। कौन जाने तीन साल में सरकार का सारा रुपया खतम हो जाए और मेरा नंबर ही नहीं आए। वह मन ही मन चिंता करती।
आखिर शारदा की किस्मत जागी। सारी प्रार्थनाएं काम आ गईं और आज शाम को उसके ससुर खुशखबरी लेकर आए- 'बीडीओ साहब की खबर आई है। मकान के कागज और चैक लेने पंचायत समिति चलना है।'
शारदा को एकाएक विश्वास नहीं हुआ। उसे तीन साल क्या, तीन महीने भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी। एक दिन की मजदूरी तो मारी जाएगी किंतु यदि वास्तव में मकान बनाने के लिए मंत्रीजी ने पचास हजार रुपए का चैक दे दिया तो उसके मन की साध पूरी हो जाएगी। यही सोच-सोच कर आज शारदा को नींद नहीं आ रही।
काफी देर तक वह यूं ही पत्थर पर बैठी रही। चंद्रमा अपने स्थान से थोड़ा और हिल गया। झाौंपड़े में सन्नाटा था। गांव की सुनसान गलियों में कुत्तों के भौंकने की आवाज जरूर उस सन्नाटे को भेद जाती थी। जाने कब उसी पत्थर पर बैठे-बैठे उसे झापकी आ गई। उसने देखा कि वह अपने पति और ससुर के साथ पंचायत समिति में खड़ी है। मंत्रीजी उसे पचास हजार रुपए का चैक थमा रहे हैं। अचानक ससुर ने शारदा के हाथ से वह चैक छीन लिया है। शारदा हक्की-बक्की खड़ी है। ससुर कह रहे हैं, ला मुझो दे! तू क्या करेगी इस चैक का?
शारदा से कुछ जवाब न बन पड़ा। बीडीओ साहब ने ससुर के हाथों से चैक लेकर फिर से शारदा को दे दिया है, वे भीखाराम पर बिगड़ रहे हैं। यह चैक तेरे काम का नहीं है। इसका पैसा केवल शारदा को मिल सकता है। ससुर के चेहरे पर बेबसी के भाव हैं। शारदा ने चैक मोड़कर ब्लाउज में रख लिया है।
'देख शारदा, इस चैक को बैंक में जमा करवा देना। थोड़ा-थोड़ा करके रुपया निकालना और अपना मकान बनाना। इन दोनों को मत देना, न अपने पति को, न ससुर को। ये तो इस रुपए को दारू में उड़ा देंगे।' शारदा चुप है।
'नहीं मालिक। हम दारू नहीं पीएंगे। इन पैसों से हमारे बच्चों के सिर पर पक्की छत ही बनेगी। मदन और भीखाराम हाथ जोड़कर बीडीओ साहब से कह रहे हैं।
'और हमारा क्या?' शारदा के हाथ से किसी ने चैक फिर से छीन लिया है। चैक तो उसने ब्लाउज में रखा था, फिर इसके हाथ में कैसे आ गया? शारदा सोचती है, और चैक छीनने वाले की तरफ देखती है।
'अरे ग्रामसेवकजी! ये क्या कर रहे हैं, लाइए चैक मुझो दीजिए। ये मेरा चैक है, इससे मेरे बच्चों का घर बनेगा।' शारदा उन पर बिफर पड़ती है।
'ध्यान से देख बावळी! मैं ग्रामसेवक नहीं हूं।' चैक छीनने वाला हंसता है।
-'अरे हां, आप तो सरपंचजी हैं। माफ करो मालिक। ये चैक मुझो दे दो।' शारदा हाथ जोड़ती है।
'बावळी हो गई है। मैं तुझो सरपंच दिखाई देता हूं?' चैक छीनने वाला चैक हवा में लहराता है। बीडीओ साहब उसके हाथ से चैक लेकर फिर से शारदा को देते हैं।
-'जा घर चली जा। यहां कोई छीन लेगा।' बीडीओ साहब स्नेह से शारदा के सिर पर हाथ रखते हैं। शारदा खुशी से रो पड़ती है। चैक फिर से उसके हाथ में आ गया है।
अचानक दृश्य बदल गया है। शारदा अपने झाौंपड़े के सामाने खड़ी है। नहीं-नहीं झाौंपड़ा नहीं, मकान के सामने खड़ी है। यह तो शारदा का ही मकान है जिस पर पक्की छत चमक रही है।
'ऐ........यहां कहां बैठकर सो रही है?' किसी ने झिांझाोड़कर उठाया। शारदा ने आंखें खोलीं तो देखा कि दिन निकल आया है। उसका पति मदन उसे झिांझाोड़कर उठा रहा है। वहां न कोई सरपंच है, न बीडीओ साहब हैं। वह तो अपने झाौंपड़े के बाहर बैठी है। पूरी रात वह इस पत्थर पर बैठी सोती रही है।
'अरे! इतना दिन निकल आया? पंचायत समिति भी तो जाना है।' शारदा ने हड़बड़ाकर कहा और पत्थर से उठ खड़ी हुई।
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