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अर्पण-तर्पण और समर्पण का सम्यक् अनुष्ठान है पितृ पक्ष – प्रो. त्रिपाठी

जीजीटीयू में वैदिक परंपरा और पितृऋण पर संगोष्ठी आयोजित  

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बांसवाड़ा. महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रो. निलिप्म त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय सनातन परम्परा में पितृ पक्ष अर्पण, तर्पण अैर समर्पण का सम्यक अनुष्ठा है। इससे ही हम पूर्वजों और पितृों के ऋण से उऋण हो सकते हैं।

प्रो. त्रिपाठी गुरुवार को गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के वेद विद्यापीठ एवं श्रीमदभागवत समिति के साझे में आयोजित वैदिक परंपरा और पितृ ऋण विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म पिंड से होने के कारण पिंडज कहा जाता है। इसीलिए भारतीय जीवन पद्धति में पिंडदान का बड़ा महत्व है।
संगोष्ठी में मुख्य अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो. विजय मेनन ने कहा कि हमारी सनातन परंपरा में संबंधों की शाश्वतता को भी सिद्ध किया है। शारीरिक नाश को कभी जीवन संबंध का अंत नहीं माना जाता। हमारे सब अनुष्ठान उसी अपृथक भाव को प्रमाणित करते हैं।
जीजीटीयू के कुलपति प्रो. आईवी त्रिवेदी ने कहा कि भारत भूमि धर्म और अध्यात्म की भूमि है। यहां वह जीवन पद्धति है जिसमें समूचे देश और विश्व कल्याण की कामना की जाती है। इससे ही रंग, जाति और वर्ण भेदों से ऊपर मनुष्य मात्र के कल्याण और उसके श्रेष्ठ स्वरूप प्राप्त करने के सूत्र सुलभ हैं। प्रारंभ में ऋग्वेद की शंख्यायानी शाखा विज्ञ इंद्रशंकर झा एवं सामवेदी सूर्यशंकर नागर के मंगलाचरण के उपरांत जयप्रकाश पंड्या ने स्वागत किया। मयूर मिल के सीईओ वायडी तिवाड़ी ने कार्यक्रम को मौजूदा दौर में प्रासंगिक बताया। इस अवसर पर डॉ. दिनेश भट्ट, मणिलाल जोशी, अंजनी त्रिवेदी, सुनील दोसी, डॉ.युधिष्ठिर त्रिवेदी भी उपस्थित थे। संचालन डॉ. दीपक द्विवेदी ने किया। आभार वेद विद्यापीठ निदेशक डॉ. महेंद्र प्रसाद और श्रीभागवत समिति अध्यक्ष रवीन्द्रलाल मेहता ने जताया।
तकनीकी सत्र में शोध-पत्रों का वाचन
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में डॉ.महिपाल सिंह राव की अध्यक्षता एवं संदर्भ व्यक्ति वेद विद्यापीठ के सचिव डॉ. विशेष पण्ड्या की उपस्थिति में पंजीकृत छात्र एवं संकाय सदस्यों ने विभिन्न विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें कारुलाल ने प्रकृति संरक्षण, सुनीता सांगेडा ने महाभारत में वर्णित पितृ ऋण की अवधारणा, देवव्रत पांडा ने वेदे जीवनोपाया विषयक पत्रवाचन किया। हिमानी यादव, डॉ.लोकेश पंड्या एवं डॉ.दीपक द्विवेदी ने भी शोध पत्र प्रस्तुत किए।