
सोनू, बाबू, माचा, शोना और पिंकी सबसे लोकप्रिय निकनेम
नई दिल्ली। हम भारतीयों के अक्सर दो नाम होते हैं। एक प्यार से घर पर बुलाया जाने वाला नाम और दूसरा, जो आगे चलकर हमारी पहचान बनता है। लेकिन अक्सर हमें प्यार अपने निकनेम से ही होता है क्योंकि उम्र का कोई भी पड़ाव हो माता-पिता, रिश्तेदार और बचपन के दोस्त हमें आज भी उसी नाम से बुलाते हैं। निकनेम यानी प्यार से रखे जाने वाले नाम का चलन केवल उत्तर भारत में ही नहीं बल्कि पूरे देश में है। स्नैपचैट और यूगोव के हालिया अध्ययन में पाया गया है कि देश में 96 प्रतिशत से अधिक लोगों का जीवन में कभी न कभी कोई निकनेम जरूर रहा है। वहीं सोनू, बाबू, माचा, शोना और पिंकी देशभर में पांच सबसे ज्यादा लोकप्रिय निकनेम हैं।
उत्तर से दक्षिण तक देश में अलग-अलग नामों का चलन:
भारत के अलग-अलग हिस्सों में निकनेम रखने का चलन भी भिन्न-भिन्न है। जैसे उत्तर भारत में गोलू और सनी, जबकि दक्षिण में अम्मू और माचा का अधिक चलन है। पूर्व में शोना और मिष्टी, वहीं पश्चिम में पिंकी और दादा निकनेम सबसे ज्यादा रखे जाते हैं। देश में आधे से ज्यादा (60%) लोगों के निकनेम उन्हें बचपन या स्कूल में मिले हैं। लेकिन अधिकांश लोग बचपन में मिले नाम को ज्यादा इस्तेमाल करते हैं क्योंकि वे इससे जुड़ाव महसूस करते हैं। शोध के अनुसार जेनरेशन जेड और मिलेनियल्स अपने निकनेम का ऑनलाइन उपयोग करना पसंद करते हैं। ऐसा वे कई कारणों से करते हैं जैसे कूल दिखने, अपनी गोपनीयता बनाए रखने या फिर इसलिए क्योंकि ऐसे नामों को याद रखना आसान होता है।
किसी के करीब महसूस करने के लिए निकनेम का प्रयोग:
देश में अधिकांश (85%) लोगों के लिए निकनेम 'गर्व की बात' हैं। केवल 15 प्रतिशत लोग ही सार्वजनिक रूप से अपने निकनेम का इस्तेमाल करने पर शर्मिंदा महसूस करते हैं। 67 फीसदी किसी के करीब महसूस करने के लिए भी निकनेम का प्रयोग करते हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि निकनेम अपनेपन की एक अलग भावना प्रदान करते हैं। 61 प्रतिशत लोगों को घर पर उनके निकनेम से ही पुकारा जाता है। सर्वे में शामिल 60 फीसदी ने बताया कि उनके साथ कई बार ऐसा हुआ है, जब लोगों को उनका निकनेम याद था लेकिन वास्तविक नाम नहीं।
दुनियाभर में संबंधों को मजबूती देते निकनेम
Published on:
22 Jun 2023 11:42 am
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