
अमित शर्मा, जयपुर। ये बात 1998 की है वो बच्चा दसवीं में पढ़ रहा था। शहर का नामी हिन्दी स्कूल (उस वक्त तक अंग्रेजी की आपाधापी नहीं थी)। पढ़ाई में ठीक-ठाक से कुछ से ज्यादा ठीक, लेकिन भाषण, कविता, न्यूज रीडिंग, एक्टिंग में अव्वल। 15 अगस्त का दिन था, स्कूल में सेलीब्रेशन था। एक झांकी में इस बच्चे को आतंकवादी का रोल मिला था। खुले में झांकी निकलनी थी तो दिवाली की बची कुछ लड़ियां (पटाखे) वो साथ लाया और झांकी में बजाये भी। अपनी झांकी निकलने के बाद वो कैंटीन में दोस्तों के साथ समोसे खा रहा था कि निशांत ने कहा, "पटाखे बचे हैं तो मुझे दे दे, क्लास में फोड़ेंगे मजा आ जायेगा।" प्रमोद भी खुश था.. और वो बच्चा भी खुश हो गया, मजा आयेगा। बच्चे ने निशांत को पटाखे दिए, उसने ग्राउंड फ्लोर की एक क्लास में पटाखे फोड़ डाले। जिसके बाद तीनों वहां से भाग छूटे। इस मुगालते में कि किसी को क्या पता चलेगा...
अगले दस मिनट में तीनों फिर से उसी क्लास रूम थे,आए नहीं थे लाए गए थे.. पीटते हुए, घसीटते हुए। तीन अलग-अलग टीचर पीछे कॉलर से पकड़ते हुए मारते हुए क्लास में ले आए और वहां उन्हें बंद कर दिया। तीनों एक दूसरे की पिटी हुई सूरत देख रहे थे। आधे घंटे बाद तीनों की प्रिंसिपल रूम तक परेड हुई और वे वहां भी पिटे। फिर स्कूल खत्म होने के बाद तीनों को घर जाने के लिए कह दिया गया। प्रमोद निशांत अपने-अपने घऱ को चल दिए। वो बच्चा सोच रहा था कि घर कैसे जाऊं। हर रोज की तरह मम्मी पापा पूछेंगे कि आज स्कूल में क्या-क्या हुआ.. तो क्या जवाब दिया जायेगा। हीरो पुक पर चलता वो बच्चा सोच रहा था, क्यों न किसी बस के आगे अपनी मोपेड घुमा दी जाये.. किस्सा खत्म... तभी खयाल आया घर चलते हैं, साफगोई से घर पर सबकुछ बता देते हैं। घर पहुंचे, जैसे ही बताया, पापा से एक कस के चांटा पड़ा, मम्मी से कई घंटों तक डांट। तीन दिन बाद स्कूल खुला, क्लास शुरू होते ही प्रिंसिपल ने उन तीनों बच्चों को बुलाया। फिर एक एक चपत लगाई और कहा कि कल अपने अपने पेरेंट्स को लेकर आना। अगले दिन पेरेंट्स के साथ पेशी हुई।
प्रिंसिपल का पहला सवाल-
इसने आपको बम फोड़ने वाली बात कब बताई? पापा- 15 अगस्त को...प्रिंसिपल- फिर ठीक है, इसका मतलब इसे अपनी गलती का एहसास है, आप जाइए। प्रमोद और निशांत अगले पन्द्रह दिन तक कभी भाई, कभी मामा को लाते रहे (शायद असली न हों) तब तक हर रोज पिटते रहे, जब तक पापा को लेकर नहीं आ गए। दोनों के पेरेंट्स से यही सवाल- आपको कब बताया, जवाब- आज सुबह ही।
इस पूरी आम सी कहानी में 'वो' बच्चा अब तक सामने नहीं आया है। लीजिए समाने लाते हैं- इस लेख का लेखक ही वो बच्चा है। सेंट जेवियर स्कूल स्कूल के नवीं क्लास के स्टूडेंट नितांत राज की सुसाइड की खबर अखबार में पढ़ी तो आंसू न रुके। खुद से जुड़ा किस्सा याद आ गया। लगा कि 15 अगस्त को वो बच्चा भी ये बड़ी गुनाह कर सकता था.. आत्महत्या का, पर सच बोल कर उसमें ताकत आई। नितांत की भी शायद यही एक कमी रही कि सब कुछ घर पर नहीं बताया और शायद बताया तो उतना सीरियसली नहीं लिया गया। नितांत जैसे सभी बच्चों से अपील, स्कूल में हो रही हर प्रताड़ना को पेरेंट्स को बताए। बैड टच गुड टच का अंतर समझ, शेयर करें।
स्कूल वाले मुझे दोनों ही किस्सों में गलत से लगते हैं। (प्रथम दृष्टया) किसी पीटीआई को हक नहीं, बच्चे को नंगे पैर घुमवाये या दूसरे बच्चों, टीचर के सामने जलील करे। नितांत के केस में स्कूल गुनहगार सा प्रतीत होता है। 'उस बच्चे' के केस में भी गलत ही था। दरअसल होना ये चाहिए था ये कि तीनों बच्चों को प्यार से समझाया जाता, कि आपके बम फोड़ने से भगदड़ मच सकती थी, स्कूल में आग लग सकती थी, मारना गलत था। पेरेंट्स को बुलाते, तीन दिन के लिए सस्पेंड करते, पर मारना गलत था। उन तीनों में से किसी ने भी नितांत का रास्ता चुना होता तो..!
नितांत ने आखिरी खत (सुसाइड नोट) में लिखा है, कि "'नीडेड जस्टिस'. हां, न्याय चाहिए।" बस्ते के बोझ के तले दब रहे बच्चों से सुविधाओं के नाम पर कैसी-कैसी फीस ली जा रही हैं। सीसीटीवी कवर्ड कैम्पस किस लिए, जब एक पीटीआई या किसी टीचर की हरकत कोई देख ही नहीं रहा।
प्लीज, बच्चों को अवेयर करें, उन्हें डरने की नहीं, बल्कि हिम्मत की खुराक दें। स्कूल्स नंबर्स और नंबर 1 की दौड़ का आतंक न बनायें, अभी रिजल्ट्स भी आने हैं, फिर ऐसी खबरें आएंगी। पेरेंट्स काउंलिंग करें बच्चों की, ममत्व और पितृत्व के भाव के साथ और स्कूल वाले तो सुधर ही जाएं.. आप पर जिम्मेदारी बेहतर 'कल' बनाने की है और आप 'आज' भी खराब कर रहे हैं, 'कल' क्या खाक सुधारेंगे।
Published on:
03 May 2018 03:07 pm
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