इस बीच मुझे काफी यात्राएं करनी पड़ती थीं। पैसे कमाने की होड़ कभी खत्म नहीं होती और न ही करियर का कोई अंत होता है। राइसा जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, मैं अपनी जिम्मेदारियां मातृत्व के रूप में लेना ज्यादा बेहतर समझने लगी। मैंने अपनी कंपनी बेच दी और बच्चों की बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए हम इंग्लैड आ गए। बच्चों के लिये मैंने अपना करियर दांव पर लगाया। हालांकि, शुरू में करियर छोडऩे के बाद मैं काफी मिस करती थी लेकिन राइसा की परवरिश मैं कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती थी। 30 साल मैंने लगातार काम किया, लेकिन मैं अब उससे ब्रेक चाहती थी। बेटा अब यूनिवर्सिटी में फ्रेंच और स्पेनिश सीख रहा है, जबकि राइसा स्कूल में है। मैंने कभी अपने बच्चों पर किसी तरह का काई दवाब नहीं डाला। बच्चों को मैंने आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की है, ताकि वो अपना फैसला स्वयं ले सकें। राइसा भी अपने फैसले खुद लेती है, मैं सिर्फ उसे मदद करती हूं।