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इस महिला ने 30 साल तक जीतोड़ मेहनत कर बनाई कंपनी, अब बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उठाया ये कदम

अब मैं यूके में प्रोपर्टी खरीदने बेचने से जुड़े व्यवसाय से जुड़ी हूं, लेकिन उसे अपनी प्राथमिकता नहीं बनाती। पहले मैं अपने बच्चों को भरपूर समय देती हूं। जब खाली वक्त मिलता है तो वो रोल प्ले करती हूं।

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lalit fulara

Jul 12, 2017

London

London

लंदन से मधु चौरसिया
फाहिमान सोउजानी बिजनेस ऑरियंटेड वुमन हैं। इनकी 13 साल की बेटी राइसा इंग्लैंड में एक जाना पहचाना चेहरा बन चुकी है। जिसे 2 साल पहले फेस ऑफ द ग्लोब का खिताब मिला। हाल ही में रइसा ने अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म दोबारा में हुमा कुरैशी के बचपन का रोल निभाया है। राइसा कई थियेटर और कॉमर्शियल विज्ञापनों में भी काम कर चुकी हैं। साथ ही हॉलीवुड की कुछ फिल्मों के लिए ऑडिशन भी दिया है। बॉलीवुड से भी कई ऑफर्स आए हैं। बेटी को इंटरनेशनल पहचान दिलाने में मां की अहम भूमिका रही है। करोड़ों बच्चों के बीच अपने बच्चे को दुनिया के सामने लाना एक मां की कड़ी मेहनत को दर्शाता है। फाहिमान का कहना है कि मैं राइसा के पीछे 24 घंटे लगी रहती हूं। 10 मिनट की शूटिंग के लिए कई बार हमें 4 या 5 घंटे का सफर तय कर लोकेशन तक पहुंचना पड़ता है। राइसा लंदन के फेमस सिल्विया यंग में ड्रामा, सिंगिंग और डांस सीखती हैं। जहां से बड़े-बड़े अमरीकी और ब्रिटिश कलाकारों ने हॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई है।

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ब्यूटी प्रोडक्टस के लिए बनाए अलग काउंटर
बेटी और बेटे के बेहतर भविष्य के लिये मैंने अपना करियर दांव पर लगाया। मैं दुबई में ब्यूटी प्रोडक्ट ‘यूरो ट्रेडिशन’ नाम की कंपनी की जनरल मैनेजर रही। ये कंपनी इंडिया में ब्यूटी प्रोडक्टस बेचती थी। इससे पहले कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स दुकानों में शैंपू और साबुन के साथ रखे मिलते थे, लेकिन मेरी कंपनी ने स्ट्रेटजी बनाई कि अब ब्यूटी प्रोडक्ट्स के लिए अलग से काउंटर बनाए जाएं। मैंने 2 लोगों से अपना बिजनेस शुरू किया था। लेकिन देखते ही देखते इस फेहरिस्त में 370 लोग जुड़ गए। मैंने ब्यूटी प्रोडक्ट्स के लिए अलग से सेल्स गर्ल की सुविधा मुहैया कराई, जिनकी ट्रेनिंग हर साल पैरिस में होती थी। ताकि वो नए-नए प्रोडक्ट्स से अवगत रहें और लोगों को उनकी त्वचा के अनुसार सही सलाह दे सकें। 10 साल पहले मैंने अपनी कंपनी बेच दी ताकि अपने बच्चों के भविष्य को तराशने में मदद कर सकूं। इसके बाद हम लंदन आ गए।

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महाराष्ट्र में हुआ जन्म, दुबई में पालन-पोषण
मेरा जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन पिता काम के सिलसिले में दुबई आ गए। इसलिए भारत को ज्यादा करीब से नहीं जान पाई। यहां भी जिंदगी आसान न थी। हम मध्यमवर्गीय परिवार से थे। मैं शुरू से कुछ अलग करना चाहती थी। हमेशा औरों से अलग सोचती थी। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। मुझे जिंदगी में हमेशा आगे बढऩे की ललक थी। मैंने 13 साल की उम्र से काम करना शुरू किया। शुरू में मैं ब्यूटी प्रोडक्ट्स के काउंटर पर प्रोडक्ट्स बेचती थी। धीरे धीरे मैंने अपनी कंपनी बनाई और जनरल मैनेजर तक का सफर तय किया। मेरे लिए भी इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। कई रुकावटें थीं। कई बड़ी चुनौतियां थी। मैंने अपना लक्ष्य अपनी महत्वकांक्षा से पाया। मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाई थी। लेकिन एक बिजनेस वुमन के तौर पर अपनी पहचान बनाने में इसलिए कामयाब रही कि मैंने जो भी सीखा वास्तविक जीवन से सीखा। किताबों से नहीं। मैं हमेशा अपने दिल से सोचती हूं।

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करियर का कभी अंत नहीं होता
इस बीच मुझे काफी यात्राएं करनी पड़ती थीं। पैसे कमाने की होड़ कभी खत्म नहीं होती और न ही करियर का कोई अंत होता है। राइसा जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, मैं अपनी जिम्मेदारियां मातृत्व के रूप में लेना ज्यादा बेहतर समझने लगी। मैंने अपनी कंपनी बेच दी और बच्चों की बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए हम इंग्लैड आ गए। बच्चों के लिये मैंने अपना करियर दांव पर लगाया। हालांकि, शुरू में करियर छोडऩे के बाद मैं काफी मिस करती थी लेकिन राइसा की परवरिश मैं कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती थी। 30 साल मैंने लगातार काम किया, लेकिन मैं अब उससे ब्रेक चाहती थी। बेटा अब यूनिवर्सिटी में फ्रेंच और स्पेनिश सीख रहा है, जबकि राइसा स्कूल में है। मैंने कभी अपने बच्चों पर किसी तरह का काई दवाब नहीं डाला। बच्चों को मैंने आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की है, ताकि वो अपना फैसला स्वयं ले सकें। राइसा भी अपने फैसले खुद लेती है, मैं सिर्फ उसे मदद करती हूं।

बच्चों को अपनी इच्छा से रास्ते चुनने का अधिकार दें अभिभावक
आज की माताओं से यही कहना चाहती हूं कि बच्चों को अपनी इच्छा से कोई भी रास्ता चुनने का अधिकार हमें उन्हें देना चाहिए। उन पर किसी तरह का दबाव नहीं देना चाहिए। गलती करने दें, उन्हें गिरने दें। गिरेंगे नहीं तो सीखेंगे कैसे? बस वापस उठकर उन्हें दोबारा चलने का मौका दें। राइसा पढ़ाई में भी अव्वल है। वो जहां भी होती है अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे निभाने की कोशिश करती है चाहे वो पढ़ाई हो या ड्रामा, थियेटर। मैं हमेशा उससे पूछती हूं बेटा तुम्हारा क्या फैसला है। मैं बच्चों को कभी नहीं कहती कि तुम डॉक्टर बनो या इंजीनियर। जैसा कि आजकल के माता पिता करते हैं। मैं उन्हें कहती हूं तुम्हारा पैशन जो है वही करो। मैं समझती हूं कि तभी बच्चा जीजान से उसमें लग जाएगा। नहीं तो जिंदगी में पछतावे के सिवा कुछ नहीं रह जाता। मैं कहती हूं , लकीर के फकीर मत बनो अपना रास्ता खुद तलाशो। कुछ नया करने की सोचो।

बेटी को मिला बॉलीवुड में मुकाम
पढ़ाई को भी मैं उतना ही महत्व देती हूं। शूटिंग का शेड्यूल यदि छुट्टियों में होता है तभी राइसा उसमें जाना पसंद करती है। एक बार हमें एक बड़े थियेटर से ऑफर मिला। एक साल का कॉन्ट्रेक्ट था। राइसा को वहीं रहना पड़ता। हालांकि, पढ़ाई में बाधा न हो इसके लिये वो वहां ट्यूटर की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। लेकिन राइसा ने कहा- नहीं मां ये मैं नहीं कर सकती, स्कूल छूट जाएगा। मैंने कहा ठीक है तुम्हें जैसा सही लगे। कुछ समय पहले ही हमें बॉलीवुड से भी राइसा के लिए लीड रोल का ऑफर मिला। लेकिन अभी वो केवल तेरह साल की है तो हमने ऑफर नकार दिया। जहां तक फिल्म दोबारा की बात है उसकी शूटिंग छुट्टियों में थी। इसलिए हमें किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई। मैं उस वक्त भी हमेशा राइसा के साथ होती थी।

बच्चों को भरपूर समय देती हूं
अब मैं यूके में प्रोपर्टी खरीदने बेचने से जुड़े व्यवसाय से जुड़ी हूं, लेकिन उसे अपनी प्राथमिकता नहीं बनाती। पहले मैं अपने बच्चों को भरपूर समय देती हूं। जब खाली वक्त मिलता है तो वो रोल प्ले करती हूं। जिन्दगी किसी की भी आसान नहीं होती। हम मुसीबत से घबराते हैं, उससे भागने की कोशिश करते हैं। लेकिन हम सब अपनी आत्मशक्ति को नहीं पहचानते। हम सब मुसीबत का सामना कर सकते हैं। अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो सकते हैं। अब मैं अपनी लाइफ इन्जॉय करती हूं। बच्चों पर फोकस करती हूं। उनके हर फैसले में साथ खड़ी होती हूं।

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