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TIPPANI: यह तो नहीं है ठीक…

मेहमान और मेजबान ...इन दोनों का गहरा ताना-बाना है और इसमें भी बात जब राजस्थानी समाज की हो तो फिर कहना ही क्या...।

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TIPPANI: यह तो नहीं है ठीक...

TIPPANI: यह तो नहीं है ठीक...

सूरत. मेहमान और मेजबान ...इन दोनों का गहरा ताना-बाना है और इसमें भी बात जब राजस्थानी समाज की हो तो फिर कहना ही क्या...। आपणी माटी से कोसों दूर ‘परदेस’ में जब भी कोई मेहमान (सरपंच से उपराष्ट्रपति तक) आता है तो समाज पलक-पांवड़े बिछा देता है और जब वो मेहमान यहां से लौटता है तो उसकी आंखों की नमी देसी आवभगत की खुशी को साफ बयां करती है। मगर कुछ समय से राजनीतिक महत्वाकांक्षा देसी मेहमानों की आवभगत पर मानों हावी होती जा रही है और नतीजन उसके गलत परिणाम व अफसोस-मलाल भी देखने-समझने को मिल रहे हैं। दो दिन पहले ही देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के पहली बार सूरत आगमन पर अभिवादन व दीपावली स्नेहमिलन समारोह का आयोजन समस्त राजस्थान-हरियाणा समाज की ओर से किया गया। हालांकि यह समारोह पूरी तरह से भाजपा प्रायोजित था और उसका असर इंडोर स्टेडियम में मंच से लेकर दर्शक दीर्घा तक साफ देखने को मिला। समारोह में उपराष्ट्रपति के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत के अलावा राजस्थान के डॉ. सतीश पूनिया, कैलाश चौधरी, पीपी चौधरी समेत अन्य नेता भी मौजूद थे। स्टेडियम को राजस्थानी संस्कृति के ओज-शौर्य, भक्ति-शक्ति और खास मेहमाननवाजी के रंग से रंगने के लिए लोकगायक भी कोई कसर नहीं छोड़े थे। समारोह में शामिल ठेठ राजस्थानियों को जहां उपराष्ट्रपति धनखड़ के मारवाड़ी भाषा में संबोधन से अपणायत की खुशी महसूस हुई और डॉ. पूनिया के राजस्थान भर में पूजनीय देवी-देवताओं की जय-जयकार से स्टेडियम में मौजूद सभी लोगों की धार्मिक श्रद्धा को भी बल मिला। इतना ही नहीं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रवासी राजस्थानियों की सरल, सादगी और व्यापारिक सूझबूझ की भी जमकर प्रंशसा अपने संबोधन में की। इन सब खुशियों के बीच इंडोर स्टेडियम में मौजूद ढाई-तीन हजार प्रवासियों को कई अफसोस-मलाल का भी अनुभव हुआ और वो भी खासकर मंच पर मौजूद एक पार्टी के स्थानीय नेताओं के व्यवहार से। मंच पर उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपाल जैसे पदों पर आसीन महानुभावों की मौजूदगी में मंच छोडक़र जाना, स्टेडियम की क्षमता के मुताबिक 25 फीसद प्रवासियों को भी नहीं जुटा पाना, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपाल के अनुकूल मंच की गरिमा नहीं रखना जैसे कई विषय थे, जिन्होंने राजस्थान की देसी परम्परा से लाड-चाव रखने वालों को खूब आहत किया। नतीजन सोशल मीडिया पर अगले दिन यह भड़ास भी खूब निकली और सभी ने एक राय में आन-बान और शान की धनी राजस्थानी परम्परा के अनुकूल नहीं माना और कहा यह तो है ठीक...।