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कानूनी डंडा फिर भी बालश्रम से छुटकारा नहीं

- विश्व बालश्रम निषेध दिवस: आ​र्थिक तंगी बनी सबसे बड़ी बाधा कानूनी डंडा फिर भी बालश्रम से छुटकारा नहीं

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श्रीगंगानगर. बदलते परिवेश में बाल श्रमिक के हितों में कई कानून बने हैं और इलाके में कई संगठन सक्रिय भी हैं। इसके बावजूद अब तक बाल श्रम से छुटकारा नहीं मिल पाया है। कहने को पुलिस की मानव तस्करी विरोधी यूनिट स्पेशल तौर पर गठित है लेकिन इस यूनिट के पास संसाधन सीमित होने के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।
यूनिट के अलावा बाल कल्याण समिति और चाइल्ड लाइन की टीमों ने कई जगह दबिश देकर बाल मजदूरी कराने वालों पकड़ा भी है, लेकिन बाल श्रम से मुक्त कराए गए बच्चों के पुनर्वास कराने के लिए प्रभावी स्कीम नहीं होने से अब भी बच्चों को मजबूरी में काम करना पड़ रहा है। यह पहलू भी सामने आया है कि बचपन को बाल श्रम में डालने के लिए कई बच्चे तो खुद आर्थिक तंगी की वजह से आए थे तो कई मौज मस्ती करने के लिए घर से निकलकर मजदूरी करने लग गए। मानव तस्करी विरोधी यूनिट के प्रभारी पवन सहारण ने बताया कि वर्ष 2023 से लेकर अब तक 38 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया है।

इस टोल फ्री पर तत्काल मदद

चाइल्ड हेल्पलाइन के टोल फ्री नम्बर 1098 पर बच्चों की मदद के लिए कॉल की जा सकती है। स्वास्थ्य सेवा, आश्रय की व्यवस्था, बेघर, बेसहारा, ग़ुमशुदा, शोषित, घर से भागे हुए बच्चे, बाल श्रमिक, बाल-विवाह, ऐसे बच्चें जिन्हें देखभाल, सुरक्षा एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता है कि तुरंत मदद करती है। चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 एवं बाल कल्याण समिति का दावा है कि पिछले एक माह में उमंग थर्ड अभियान के तहत 18 बच्चों को बालश्रम से मुक्त करवाया है। किशोर न्याय अधिनियम, बालश्रम प्रतिषेध अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज कराया जाता है।

यहां बचपन छिन्न भिन्न

सांझ ढलते ही जवाहरनगर इलाके में कई नमकीन की दुकानों के आगे कार पर सवार लोगों को उनको मीनू कार्ड दिखाते हुए मिल जाएंगे। यही हाल देर रात को मैरिज पैलेसों से प्लास्टिक डिस्पोजल को बीनते हुए कई बालक-बालिकाएं देख जा सकते है। बाजार एरिया और दुर्गा मंदिर एरिया में तो पैसे मांगते देखा जा सकता है। जिला अस्पताल के पास तो यही तस्वीर रोजाना देखने को मिलती है।

तब सख्ती हुई तो कई बाल श्रमिक हुए मुक्त

कुछ अर्से पहले इलाके में पंजाबी चूड़े का निर्माण कार्य बड़े स्तर पर होता था। इन चूड़ों पर नग लगाने का बारीक कार्य बड़े लेबर के बजाय बाल श्रमिकों से कराया जाता।हाथ छोटे और अंगुलियां होने के कारण वे आसानी से और जल्दी चूड़ों पर नग लगा देते। इस कार्य के लिए बिहार, उत्तरप्रदेश या पश्चिम बंगाल से बच्चों को यहां लगाया जाता था लेकिन जब मानव तस्करी यूनिट ने दबिश दी तो बिहार, यूपी और पश्चिम बंगाल के दर्जनों बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराने में मदद मिली थी।

सामाजिक सुरक्षा की जरूरत

बाल कल्याण समिति अध्यक्ष जोगेन्द्र कौशिक का कहना है कि ज्यादातर बाल मजदूरी मामलों में पारिवारिक की आर्थिक तंगी सामने आई है। इस वजह से जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए, उनका बचपन जोखिम क्षेत्र वाले कार्य स्थल निगल रहे हैं। कई मामलों में परिवार का सहारा बालक हैं। किसी के पिता तो किसी का मां के निधन होने के कारण आर्थिक विषमता दूर करने के लिए बाल मजदूरी करने की मजबूरी है।

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