श्रीगंगानगर। प्रदेश की जनता को स्वास्थ्य का कानूनी अधिकार देने के लिए बनाए गए राइट टू हेल्थ बिल के विरोध में चिकित्सकों ने शनिवार को कामकाज ठप कर दिया। वहीं राजकीय जिला चिकित्सालय में भी सुबह नौ बजे से सुबह ग्यारह बजे तक ओपीडी बंद रही। रोगियों की उपचार कराने के लिए लंबी कतारें लग गई। इधर, प्राइवेट अस्पतालों से रोगी और उनके परिजन राजकीय जिला चिकित्सालय परिसर में लेकर आए, यहां भी सुबह ग्यारह बजे के बाद चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं शुरू की। चिकित्साल परिसर में भारी भीड़ होने के कारण लोग परेशान नजर आए। दवा केन्द्रों पर भी दवाई लेने के लिए लंबी कतारें देखने को मिली। इधर, आईएमए के जिला सचिव डा. हरीश रहेजा की अगुवाई में चिकित्सकों ने सुखाडि़या मार्ग से कलक्ट्रेट तक रोष मार्च निकाला। इस दौरान डा.रहेजा का कहना था कि गहलोत सरकार वोटों की राजनीति कर रही है और इस बिल को जानबूझकर थोंपना चाहती है। यदि ऐसा हुआ तो सरकार बदलने के लिए चिकित्सक समुदाय भी ताकत रखते है। उनका कहना था कि राइट टू हेल्थ बिल में घायल रोगी का बिल कौन वहन करेगा, यह सरकार नहीं बता रही है।
विदित रहे कि राइट टू हेल्थ बिल के तहत मरीजों को निजी अस्पतालों में भी आपातकालीन स्थिति में नि:शुल्क इलाज मिल सकेगा। इलाज के दौरान मरीज की अस्पताल में मौत होने पर भुगतान नहीं होने पर भी शव रोका नहीं जा सकेगा। अस्पतालों में जातिगत भेदभाव नहीं हो सकेगा। उधर, निजी अस्पतालों के डॉक्टर राइट टू हेल्थ बिल जमकर विरोध कर रहे हैं। स्वास्थ्य के अधिकार कानून से प्राइवेट अस्पताल आपातकालीन स्थिति में नि:शुल्क इलाज के लिए बाध्य हो जाएंगे। बिना किसी पेमेंट के इलाज के लिए बाध्य किए जाने पर निजी अस्पतालों के डॉक्टर इस बिल के विरोध में उतर आए हैं। निजी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि इमरजेंसी की परिभाषा और इसके दायरे को तय नहीं किया गया है। ऐसे में चिकित्सकों के लिये अस्पताल का संचालन मुश्किल हो जाएगा।
फ्री उपचार करने पर चिकित्सक विरोध में
राइट टू हेल्थ’ बिल के अन्तर्गत आपातकाल यानी इमरजेंसी के दौरान निजी अस्पताल मरीजों का फ्री इलाज करने के लिए बाध्य होंगे। मरीज के पास पैसे नहीं हैं तो भी उसे इलाज के लिए इनकार नहीं किया जा सकता। इस बिल के लागू होने के बाद इलाज के दौरान मरीज की अगर अस्पताल में मौत हो जाती है और मरीज के परिजन बकाया पैसों के अभाव में अस्पताल प्रबंधन की ओर से शव को रोक नहीं सकेंगे। इसके वहीं इलाज के दौरान यदि मरीज को रेफर किया जाता है, तो उसके इलाज से संबंधित सारी जानकारी परिजन को देनी होगी और मरीज की बीमारी को गोपनीय रखना होगा। इसके अलावा इंश्योरेंस स्कीम में चयनित अस्पतालों में निशुल्क उपचार का अधिकार होगा. इसके अलावा स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता के साथ मरीज या उसके परिजन दुर्व्यवहार नहीं करेंगे साथ ही अप्राकृतिक मृत्यु के मामले में पोस्टमार्टम करने की अनुमति देनी देने के प्रावधान भी किये गए है।
इसलिए निजी हॉस्पिटल संचालकों में मची है खलबली
राइट टू हेल्थ बिल में आपातकाल यानी इमरजेंसी के दौरान निजी अस्पतालों को फ्री इलाज करने के लिए बाध्य किया गया है। मरीज के पास पैसे नहीं हैं तो भी उसे इलाज के लिए इनकार नहीं किया जा सकता। निजी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि इमरजेंसी की परिभाषा और इसके दायरे को तय नहीं किया गया है। हर मरीज अपनी बीमारी को इमरजेंसी बताकर निःशुल्क इलाज लेगा तो अस्पतालों के सामान्य खर्चे भी नहीं निकल पाऐंगे। इस बिल में राज्य और जिला स्तर पर प्राइवेट अस्पतालों के महंगे इलाज और मरीजों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्राधिकरण का गठन प्रस्तावित है। निजी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि प्राधिकरण में विषय से जुड़े विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए। जिससे वे अस्पताल की परिस्थितियों व इलाज की प्रक्रिया को समझ सकें। बिल में यह भी प्रावधान है कि अगर मरीज गंभीर बीमारी से ग्रसित है और उसे इलाज के लिए किसी अन्य अस्पताल में रेफर करना है तो एम्बुलेंस की व्यवस्था करना अनिवार्य है। इस नियम पर निजी अस्पतालों के डॉक्टरों का कहना है कि एंबुलेंस का खर्चा कौन वहन करेगा। अगर सरकार भुगतान करेगी तो इसके लिए क्या प्रावधान है, यह स्पष्ट किया जाए। राइट टू हेल्थ बिल में निजी अस्पतालों को भी सरकारी योजना के अनुसार सभी बीमारियों का इलाज निशुल्क करना है। निजी अस्पतालों के डॉक्टरों का कहना है कि सरकार अपनी योजना को निजी अस्पतालों में लागू करने के लिये बाध्य किया जा रहा है। जबकी योजनाओं के पैकेज अस्पताल में इलाज और सुविधाओं के खर्च के मुताबिक नहीं है। दुर्घटनाओं में घायल मरीज, ब्रेन हेमरेज और हार्ट अटैक से ग्रसित मरीजों का इलाज हर निजी अस्पताल में संभव नहीं है। ये मामले भी इमरजेंसी इलाज की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में निजी अस्पतालों के लिये संबं धित मरीजों का इलाज कर पाना संभव नहीं होगा। इसके लिए सरकार को अलग से स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। अस्पताल खोलने से पहले 48 तरह की एनओसी लेनी पड़ती है। इसके साथ ही हर साल रिन्यूअल फीस, स्टाफ की तनख्वाह और अस्पताल के रखरखाव पर लाखों रुपए का खर्च होता है। अगर सभी मरीजों का पूरा इलाज मुफ्त में करना होगा तो अस्पताल अपना खर्चा कैसे निकालेगा। ऐसे में अगर राइट टू हेल्थ बिल को जबरन लागू किया को निजी अस्पताल बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।