
खामोश हुई दबंग आवाज, पूर्व डायरेक्टर महेश बुडानिया का निधन
श्रीगंगानगर। सत्ता का लालच ठुकरा कर अपनी जनता के बीच रहना पसंद करने वाले विरले ही इस धरती पर जन्म लेते है। इलाके में अपनी दबंग आवाज के धनी पूर्व जिला परिषद डायरेक्टर महेश बुडानिया अब दुनिया में नहीं रहे। करीब 53साल के इस नेता ने जरुरतमंदों और पीडि़तों की मुखर आवाज बनकर इलाके में ऐसी छाप छोड़ी कि आने वाली पीढिय़ां याद रखेगी।
राजकीय महाविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे बुडानिया ने शनिवार को यहां तपोवन ट्रस्ट में अंतिम सांस ली। पिछले दो सालों से कैंसर रोग से पीडि़त बुडानिया को कई बार जयपुर सहित कई शहरों में उपचार करवाना पड़ा। गैर कांग्रेस का यह चेहरा करगिल युद्ध के दौरान भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से सटे खेतों में माइन्स बिछाने के एवज में किसानेां को मुआवजा दिलाने में बुडानिया की अहम भूमिका रही। दिवंगत पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह राठौड़ के हमजाली बुडानिया ने अपने बलबूते पर वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में राठौड़ को जितवाया था।
जब वर्ष 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत ने जब श्रीगंगानगर विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी बनकर आए तो जनता दल के उम्मीदवार सुरेन्द्र सिंह राठौड़ के बीच कांटेदार मुकाबला में अहम भूमिका बुडानिया ने निभाई थी। इस चुनाव में राठौड़ और शेखावत दोनों को हार मिली और कांग्रेस उम्मीदवार राधेश्याम गंगानगर को जीत मिली थी। वर्ष 1998 और वर्ष 2003 के चुनाव में बुडानिया का भाषण सुनने के लिए युवा उत्सुक रहते थे। गांव दौलतपुरा के सरपंच और पंचायत समिति का डायेरक्टर का चुनाव भी बुडानिया ने जीता था।
भाजयुमो का पहली बार मिली पहचान
श्रीगंगानगर जिले में भाजपा का नाम नहीं था। वर्ष 2003 में जब पहली बार राठौड़ भाजपा के सिम्बल से चुनाव जीतकर विधायक चुने गए तो यहां कमल खिला। इस कमल खिलाने के लिए पूर्व डायरेक्टर बुडानिया को भारतीय जनता युवा मोर्चा का जिलाध्यक्ष की नियुक्ति की तब उन्हेांने इलाके के अधिकांश युवाओं को जनता दल और कांग्रेस से अलग कर अपने संगठन में जगह दी। यही वजह है कि इलाके के पूर्व छात्र संघ अध्यक्षों रमजान अली चोपदार, बलविन्द्र गोदारा, सुरेन्द्र पारीक, अजय नागपाल सोनू, दीपक जसूजा, मदन मेव, दीपक, शिव कुमार शर्मा, संजीव खीचड़, अरुण गोदारा, आत्माराम सिहाग, कृष्ण भांभू, रणधीर भींचर के अलावा भारतीय जनता पार्टी नगर मंडल अध्यक्ष प्रदीप धरेड़ आदि युवाओं के रॉल मॉडल बने। जरुरतमंदों का मसीहा अपनी जुबान से साफ साफ कहने का फायदा उन लोगों को मिला जिनकी सुनवाई कोई अधिकारी या कर्मचारी नहीं करता है। इसका राजनीतिक लाभ पूर्व विधायक राठौड़ ने उठाया और वे विधायक बन गए।
तब बुडानिया ने संभाली कमान
राजनीतिक गलियारे में यह किस्सा भी चर्चित है कि पूर्व विधायक राठौड़ ने जब वर्ष 1998 में चुनाव निर्दलीय लड़ा तो वे अस्वस्थ हो गए। तब महियांवाली गांव में रात करीब आठ बजे नुक्कड़ सभा आयोजित हुई थी, इस सभा में प्रत्याशी राठौड़ नहीं आए तो बुडानिया ने इस सभा की कमान संभाली। इस सभा में बुडानिया को राठौड़ से अधिक ज्यादा तवज्जो मिली, अगले दिन सुबह जब राठौड़ के पास रात को हुई सभा का फीडबैक मिला तो उन्हेांने बुडानिया को अपने गले लगाकर लिपट गए और बोले कि तुम्हारा यह अहसान कैसे चुकाऊंगा। दोनों इतने भावुक हो गए कि वहां बैठे कार्यकर्ता भी अपने आंसूओं को रोक नहीं पाए।
Published on:
06 Oct 2018 03:30 pm
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