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सरहद के रेतीले धोरों में दफ़न है लैला मजनूं के इश्क की दर्दनाक दांस्ता, प्रेमी मांगने आते हैं मन्नतें

सरहद पर प्यार का पैगाम देती लैला मजनूं की मजारें, हिन्दू करते हैं सजदा

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Laila Majnu Love Story

Laila Majnu Mazar in Sri Ganganagar, Laila Majnu Love Story

अनूपगढ़/ श्रीगंगानगर। भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित गांव बिंजौर में दो मजारें हैं। मान्यताओं के अनुसार लोगों की मन्न्तें यहां पूरी होती हैं। जिस पर लोग अपनी मन्नतें मांगने के लिए आते हैं और पूरी होने पर मन्नत उतारने भी आते हैं। गांव के बुर्जुगों ने बताया कि भारत-पाक विभाजन के बाद भी तारबंदी से पूर्व पाकिस्तान से लोग मजारों पर सजदा करने के लिए आते रहे हैं। लेकिन अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि यह मजारें लैला मजनू की हैं, लेकिन लोगों की श्रद्धा इस कदर है कि राजस्थान के अलावा भी हरियाणा पंजाब तथा दिल्ली सहित अन्य राज्यों से लोग इन मजारों पर मन्नत मांगने के लिए आते हैं। ग्रामीणों के अनुसार इस गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है तथा मेला कमेटी में भी एक भी मुस्लिम नहीं है। यहां मजारों पर सजदा हिन्दू करते हैं। मजारों पर मंदिरों की तरह एक घंटी भी लगी है। इन सभी के कारण यह मजारें हिन्दू-मुस्लिम एकता की सद्भावना की प्रतीक हैं। इन मजारों पर पिछले कई वर्षों से दो अखंड दीपक जल रहे हैं।

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प्यास से तड़प कर लैला मजनूं ने दे दी थी जान


लैला मजनूं के अमर प्रेम से सारी दुनिया वाकिफ है। कहा जाता है कि लैला मजनूं ने गंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील की इसी धरती पर प्यास से तड़प तड़प कर जान दे दी थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि रेतीले धोरो में दफ़न है मोहब्बत की वो दर्दनाक दांस्ता। जहां एक प्रेमी जोड़े ने एक दूसरे के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे। यह भी कहा जाता है कि उस समय यहां दूर दूर तक रेत के टीले थे। जीवन कहीं नजर ही नहीं आता था। इन्ही मजारों पर अमर प्रेम के प्रतीक लैला मजनूं का हर वर्ष मेला भरता है। लैला मजनूं की मजार पर प्रेमी अपने प्यार की सलामती की दुआ मांगने आते हैं।

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लैला-मजनूं की मजार के प्रति ये है धारणा

लैला मजनू कमटी के पुराने सेवादारों ने मजार के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वे 1962 से बिंजौर गांव में रह रहे हैं, तब यहां पूरे क्षेत्र में जंगल था और घग्घर बाढ़ के दिनों में लैला-मजनू की मजार के चारों ओर भारी मात्रा में पानी भर जाने के बावजूद भी मजार में पानी नहीं जा पाता था।

उन्होंने बताया कि 1965-66 में उन्होंने यह मंजर अपनी आंखों से देखा साथ ही मजार के ऊपर 2 दीपक अपने आप जलते और बुझते रहते थे। सीमा पर तारबंदी से पूर्व पाक क्षेत्र से भी मुस्लिम लोग लैला-मजनू की मजार पर मन्नत मांगने आया करते थे और उनसे ही जानकारी मिली थी कि यह मजार लैला-मजनू की है और ये अमर है, उन्होंने सच्चा प्यार किया था।

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ग्रामीणों के अनुसार मजनू और लैला दोनों ने की प्यास से तड़प तड़प कर यहां जान निकली थी, तभी से ही यह मजार बनी है।

उन्होंने बताया कि 1972 में इस मजार पर एक पर्चा हुआ, उसके बाद मान्यता बढ़ती गई और भारी मेला लगने लगा, जनसहयोग से चंदा एकत्र करके कमेटी द्वारा हर साल मेले की सभी व्यवस्थाएं की जाती है। उन्होंने बताया कि मजार पर सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले लोगों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है, इसलिए लैला-मजनू की यह मजार प्रेमी जोड़ों के लिए आस्था का केन्द्र बनी हुई है।

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शुरू हुई मेले की तैयारियां


भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित गांव बिंजौर में हर वर्ष इन मजारों पर मेला भरता है। इस बार भी यहां लगने वाले वार्षिक मेले की तैयारियां शुरु कर दी गईं हैं। मेले को सफल बनाने के लिए मेला कमेटी के सदस्यों ने बैठक कर मेले में किए जाने वाले इंतजामों पर चर्चा कर जिम्मेदारियां बांंटी। मेला कमेटी के अध्यक्ष जरनैल सिंह भट्टी ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मेले में कब्बडियां तथा कुश्ती की प्रतियोगिताएं होंगी, जिनमें राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों की टीमें भी भाग लेंगी। हर वर्ष मेले में भाग लेने वाली टीमों के अलावा अन्य टीमों को भी आमंत्रण भेेेजा गया है। मेले में अस्थाई दुकाने लगाने वालों ने मेले के लिए अपनी मनपसंद जगह पर निशाान लगा दिए हैं। मेले में गर्मी को देखते हुए रास्ते में अनेक लोगों द्वारा ठण्डे पानी की छबील लगाई जाएगी। मेला कमेटी के गुरचरण सिंह, हरभजन सिंह, केहर सिंह, रमेश सिंह, दर्शन सिंह, प्यारा सिंह, जीत सिंह, अनूप सिंह, संदीप, प्रदीप, मनवीर व काला सिंह ने बताया कि मेले में लंगर अटूट बरताया जाएगा। पिछले कई वर्षों से यह मेला 5 दिवसीय हुआ करता था, लेकिन गर्मी की वजह से इस बार मेेला दो दिवसीय होगा।